बेटे की अंतर-जातीय शादी पर पूरे परिवार का बहिष्कार; जानिए ठाणे के सोहनलाल जैन मामले का पूरा सच

Social Boycott Case Thane: ठाणे में अंतर-जातीय विवाह के बाद जैन परिवार का सामाजिक बहिष्कार। छप्पन बागड़ ट्रस्ट पर लगा धमकी और वसूली का आरोप। जानें क्यों बहिष्कार विरोधी कानून के बाद भी पुलिस मौन है।
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विवाह और बहिष्कार की सांकेतिक फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Thane Social Boycott Case Jain Family: ठाणे के पांचपाखाडी, नामदेववाडी इलाके में रहने वाले सोहनलाल जैन और उनके परिवार को पिछले लगभग एक साल से अपने ही समुदाय द्वारा कठोर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। इस विवाद की मुख्य वजह उनके बेटे द्वारा किया गया अंतर-जातीय या अंतर-पंथीय विवाह है।

छप्पन बागड़ ट्रस्ट का दमनकारी फरमान

पीड़ित परिवार के अनुसार, छप्पन बागड़ नामक ट्रस्ट ने उनके खिलाफ यह दमनकारी फरमान जारी किया है। इस बहिष्कार की योजना विवाह से पहले ही बना ली गई थी। शादी से पहले एक बैठक आयोजित की गई जिसमें पूरे समाज को सख्त निर्देश दिए गए कि कोई भी इस विवाह समारोह में शामिल न हो। जो लोग इस चेतावनी के बावजूद शादी में शामिल हुए, उन पर 11,000 से 15,000 रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया गया और उनसे जबरन लिखित माफीनामा भी लिया गया। ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति इस परिवार को किसी कार्यक्रम में आमंत्रित करता है, तो उसे भी समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।

करीबी रिश्तेदार मिलने से कतराते हैं

इस बहिष्कार का असर इतना व्यापक है कि परिवार के करीबी रिश्तेदार भी उनसे सीधे मिलने से कतराते हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि कभी उन्हें किसी निजी पारिवारिक कार्यक्रम में बुलाया भी जाता है, तो उनसे शर्त रखी जाती है कि वे घर के भीतर ही रहें और सार्वजनिक रूप से बाहर न निकलें। हाल ही में मुंबई में आयोजित जैन समुदाय के एक बड़े सम्मेलन में भी इस परिवार को पूरी तरह अनदेखा किया गया और आमंत्रित नहीं किया गया।

वसूली, धमकी और अपमानजनक व्यवहार के आरोप

कानूनी स्थिति की बात करें तो सोहनलाल जैन ने ठाणे के नौपाड़ा पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उनके कानूनी सलाहकार का तर्क है कि यह मामला महाराष्ट्र सामाजिक बहिष्कार विरोधी कानून 2016 के तहत एक गंभीर और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। शिकायत में वसूली, धमकी और अपमानजनक व्यवहार के भी आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, पीड़ित परिवार का यह गंभीर आरोप है कि पुलिस ने शिकायत मिलने के बावजूद अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की है और न ही दोषियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई की है। यह मामला समाज में व्याप्त रूढ़िवादी प्रथाओं और कानून के प्रवर्तन में होने वाली सुस्ती को उजागर करता है।