

Rashtrasant Tukdoji Maharaj: “झाड़-झुड़ले शस्त्र बनेंगे, भक्त बनेगी सेना। पत्थर सारे बॉम्ब बनेंगे, नाव लगेगी किनारे॥” इन्ही शब्दों ने भगवान की भक्ति में लीन भक्तों के अंदर क्रांती का सागर भर उन्हे अंग्रेजों के खिलाफ खड़े रहने पर मजबूर कर दिया। भारत की आजादी का इतिहास केवल आंदोलनों, जेल यात्राओं और राजनीतिक नेताओं के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें संतों, समाज सुधारकों और जननायकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
ऐसे ही महान राष्ट्रभक्त थे राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज, जिन्होंने आध्यात्मिकता को राष्ट्रसेवा से जोड़ा और अपनी खंजिरी की थाप तथा ओजस्वी भजनों के माध्यम से गांव-गांव में आजादी और देशभक्ति की चेतना जगाई। आजादी की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर उनका योगदान आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा देता है।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने पारंपरिक वाद्य यंत्र खंजिरी को केवल भक्ति का माध्यम नहीं रहने दिया। उन्होंने इसके जरिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों में जागरूकता और राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा की। उनके भजनों में गुलामी के खिलाफ आवाज, आत्मसम्मान और देश के लिए कुछ कर गुजरने का संदेश मिलता था। उनकी ओजस्वी वाणी का प्रभाव ग्रामीण समाज पर विशेष रूप से पड़ा। अशिक्षित ग्रामीणों से लेकर युवाओं और महिलाओं तक बड़ी संख्या में लोग उनके विचारों से प्रभावित हुए। उनके भजनों की पंक्तियां लोगों में संघर्ष और साहस की भावना पैदा करती थीं।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तुकडोजी महाराज विदर्भ में जनजागरण के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उनके विचारों से प्रभावित होकर कई स्थानों पर ग्रामीणों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन तेज किया। चिमूर, आष्टी और यावली-बेनोडा जैसे क्षेत्रों में हुए विद्रोहों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
बताया जाता है कि उनके द्वारा स्थापित आरती मंडलों के कार्यकर्ताओं ने भी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिना आधुनिक संचार साधनों के भी आंदोलन की चेतना कई क्षेत्रों तक पहुंची। ग्रामीणों में यह विश्वास पैदा हुआ कि स्वतंत्रता केवल नेताओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटिश सरकार चिंतित थी। 28 अगस्त 1942 को उन्हें चंद्रपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल और बाद में रायपुर जेल में रखा गया। जेल में भी उनका संघर्ष जारी रहा। उन्होंने कारागार को ‘कृष्ण मंदिर’ की तरह स्वीकार किया और किसी विशेष सुविधा का लाभ लेने से इनकार किया। वे स्वयं अपने कपड़े धोते और अन्य कैदियों को आत्मनिर्भरता का संदेश देते थे। जेल से भी उन्होंने अपने अनुयायियों को शांतिपूर्ण आंदोलन और सत्याग्रह जारी रखने के लिए प्रेरित किया। करीब 100 दिनों की कैद के बाद बढ़ते जनदबाव के बीच ब्रिटिश सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा।
वर्ष 1948 में हैदराबाद के भारत में विलय के संकट के दौरान उन्होंने श्रीगुरुदेव सेवा मंडल के स्वयंसेवकों को संगठित किया और राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाई। इस अभियान के लिए नागपुर के श्रीमंत दादासाहेब धनवटे ने शस्त्र और आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया। राष्ट्रसंत ने स्वयंसेवकों के साथ हैदराबाद संस्थान की सीमाओं का दौरा किया और अपने ओजस्वी भजनों के माध्यम से लोगों तथा जवानों में देशभक्ति, साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जागृत की। उन्होंने अपने संदेशों के जरिए लोगों को एकजुट होकर देश की अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का राष्ट्रसेवा का अभियान स्वतंत्रता मिलने के बाद भी नहीं रुका। हैदराबाद मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने अपने श्रीगुरुदेव सेवा मंडल के स्वयंसेवकों के साथ लोगों में जागरूकता पैदा की। 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी उन्होंने भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाया। वे सैनिकों की चौकियों तक पहुंचे और खंजिरी भजनों के जरिए जवानों में देशभक्ति और आत्मविश्वास की भावना जगाई। राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का जीवन बताता है कि देशभक्ति केवल सीमा पर लड़ने तक सीमित नहीं है। समाज को जागरूक करना, लोगों को एकजुट करना, आत्मनिर्भरता का संदेश देना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना भी राष्ट्रसेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज भारतीय संत परंपरा के एक अत्यंत अद्वितीय और तेजस्वी रत्न थे, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक विचारों और ओजस्वी वाणी से समाज में अभूतपूर्व जागृति पैदा की। उनका जन्म 30 अप्रैल 1909 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक छोटे से गांव 'यावली' में हुआ तो वहीं केवल 58 वर्ष के अपने अल्प जीवनकाल में राष्ट्र की अनवरत सेवा करने वाले इस महान क्रांतिकारी संत का महापरिनिर्वाण 11 अक्टूबर 1968 को गुरुकुंज आश्रम में हुआ।