लोहगढ़ किले का नाम लोहगढ़ क्यों पड़ा? जानें छत्रपति शिवाजी महाराज के इस तिजोरी का रहस्य और पूरा इतिहास
Lohagad Fort History: लोहगढ़ किले का नाम लोहगढ़ क्यों पड़ा? जानें छत्रपति शिवाजी महाराज की इस अभेद्य तिजोरी का रहस्य, इसका 2000 साल पुराना इतिहास, सूरत अभियान का खजाना और मुख्य आकर्षण।
- Written By: गोरक्ष पोफली
लोहगढ़ किले की फोटो (सोर्स: एआई फोटो)
Why Lohagad Fort Is Called Lohagad: महाराष्ट्र की सह्याद्रि पर्वतमालाओं में स्थित किलों का इतिहास साहस और शौर्य की गाथाओं से भरा है। इन्हीं में से एक बेहद खास किला है लोहगढ़, जिसे महाराष्ट्र का लोहे का किला भी कहा जाता है। यह किला न केवल अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसका संबंध सीधे छत्रपति शिवाजी महाराज के रणनीतिक कौशल और उनके खजाने से भी जुड़ा है।
लोहगढ़ का मराठा इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने पहली बार 1648 ईसवी में इस किले पर कब्जा किया था। हालांकि, 1665 में मुगलों के साथ हुई पुरंदर की संधि के तहत उन्हें यह किला सौंपना पड़ा था। लेकिन वीर शिवाजी महाराज ने हार नहीं मानी और 1670 ईसवी में इसे फिर से जीत लिया।
किले को दोबारा जीतने के बाद, महाराज ने इसे अपनी तिजोरी के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, सूरत के अभियान से प्राप्त की गई विशाल धन-संपदा और जीत के अन्य रत्नों को सुरक्षित रखने के लिए इसी किले को चुना गया था। इसकी मजबूती और दुर्गम बनावट ही वह कारण थी कि इसे राज्य का खजाना रखने के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना गया।
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क्यों कहा जाता है इसे लोहगढ़?
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, लोहगढ़ का अर्थ है लोहे का किला। लेकिन यह नाम केवल इसकी किसी धातु की बनावट के कारण नहीं, बल्कि इसकी अजेयता और अभेद्य सुरक्षा प्रणाली को दर्शाता है। समुद्र तल से लगभग 1,033 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह किला अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण शत्रुओं के लिए जीतना लगभग असंभव माना जाता था। इसकी दीवारों और भौगोलिक स्थिति की मजबूती के कारण ही इसे यह गौरवशाली नाम मिला।
2000 साल पुराना इतिहास और प्राचीन शिलालेख
लोहगढ़ किले का महत्व केवल मराठा काल तक ही सीमित नहीं है। इतिहासकारों का मानना है कि इसका इतिहास कम से कम 2,000 साल पुराना है। यहां सातवाहन, चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, बहमनी, निज़ाम और मुगल जैसी कई महान राजवंशों ने शासन किया है।
वर्ष 2019 में किले की एक गुफा में जैन ब्राह्मी शिलालेख (पहली या दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) की खोज हुई थी। प्राकृत भाषा से प्रभावित संस्कृत में लिखा यह शिलालेख बताता है कि प्राचीन काल में भी यह स्थान कितना महत्वपूर्ण था। बाद के वर्षों में, महान मराठा राजनेता नाना फडणवीस ने भी यहां निवास किया और किले के भीतर पानी के टैंक और सीढ़ीदार कुओं जैसी संरचनाओं का निर्माण करवाया।
पर्यटन और प्राकृतिक सुंदरता
आज लोहगढ़ केवल इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी एक स्वर्ग है। विशेष रूप से मानसून के दौरान यहां का नजारा बदल जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, बादलों से ढकी चोटियां और झरने इसे महाराष्ट्र का सबसे पसंदीदा पर्यटन स्थल बनाते हैं।
किले के मुख्य आकर्षणों में इसका उत्तर-पश्चिमी हिस्सा शामिल है, जिसे विंचू काटा मतलब बिच्छू की पूंछ कहा जाता है। इसका आकार बिच्छू जैसा दिखने के कारण इसे यह नाम दिया गया है। इसके अलावा, किले के चार भव्य द्वार गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा आज भी काफी अच्छी स्थिति में हैं। पास में ही स्थित भाजा की गुफाएं और विसापुर का किला भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। आज भले ही केतन अग्रवाल मर्डर केस के कारण अचानक लोहगढ़ किला चर्चा का केंद्र बना है, लेकिन लोहगढ़ का इतिहास कई राजघरानों के लिए गौरव की बात रहा है।
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इन सब मामलों के अलावा लोहगढ़ पर्यटन के लिये एक बहतरीन जगह मानी जाती है। लोहगढ़ की यात्रा न केवल आपको प्रकृति के करीब ले जाती है, बल्कि यह मराठा साम्राज्य की उस गौरवशाली विरासत की याद दिलाती है जिसे शिवाजी महाराज ने अपने साहस और दूरदर्शिता से सींचा था।
