Sanjay Nirupam Interview: युवाओं को भड़काना आसान, नेतृत्व के लिए अनुभव जरूरी, नवभारत से बोले संजय निरुपम

Sanjay Nirupam Statement: शिवसेना नेता संजय निरुपम ने नवभारत-नवराष्ट्र पुणे कार्यालय के दौरे पर युवाओं की राजनीति, मराठा आरक्षण, नीट पेपर लीक और उद्धव ठाकरे पर अपने बेबाक विचार रखे।
Sanjay Nirupam's statement: It is easy to unite the youth for the movement
संजय निरुपम नवभारत पुणे कार्यालयफोटो सोर्स- नवभारत
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Highlights

  • संजय निरुपम बोले, युवाओं को आंदोलन से जोड़ने के साथ सक्षम नेतृत्व देना बड़ी चुनौती।

  • मराठा युवाओं के रोजगार, आरक्षण और कुणबी प्रमाणपत्र से जुड़े मुद्दे सुलझाने पर जोर।

  • शिक्षक-स्नातक चुनावों में मतदाताओं से सीधा संपर्क और स्थानीय मुद्दे अहम बताए।

Sanjay Nirupam Navbharat Pune Office: युवाओं की भावनाओं को आवाज देकर उन्हें आंदोलन के लिए एकजुट करना आसान है, लेकिन उन्हें सही दिशा देकर सक्षम नेतृत्व खड़ा करना बड़ी चुनौती है। इसके लिए केवल सोशल मीडिया पर लोकप्रियता या किसी आंदोलन की लहर पर्याप्त नहीं होती, बल्कि अनुभव, संघर्ष, विषय का गहन अध्ययन और आत्ममंथन भी जरूरी है, यह मत शिवसेना के नेता संजय निरुपम ने व्यक्त किया।

निरुपम ने शुक्रवार को नवभारत-नवराष्ट्र के पुणे कार्यालय का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने युवाओं की बदलती मानसिकता, महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों, मराठा आरक्षण तथा शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावों सहित विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय रखी।

नीट पेपर लीक आंदोलन का किया उल्लेख

युवाओं के आंदोलनों पर चर्चा करते हुए निरुपम ने नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के विरोध में हुए आंदोलन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कॉक्रोज जनता पार्टी (सीजेपी) के अभिजीत दीपके और अन्य कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर आंदोलन खड़ा किया था। विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा मामला होने के कारण इसे छात्रों, अभिभावकों और आम नागरिकों का व्यापक समर्थन मिला।

हालांकि, निरुपम के अनुसार, जब इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने केंद्रीय चुनाव आयुक्तों के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन शुरू किया, तो उन्हें मिलने वाले जनसमर्थन में कमी आई। उन्होंने इस उदाहरण के जरिए कहा कि किसी मुद्दे पर लोगों को एकजुट करना और उस समर्थन को व्यापक राजनीतिक नेतृत्व में बदलना दो अलग-अलग बातें हैं।

संजय राउत के बयानों पर निशाना

शिवसेना नेता राज्यसभा सासंद संजय राउत के राजनीतिक बयानों की आलोचना करते हुए निरुपम ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में किसी भी व्यक्ति को तथ्यों के आधार पर और सोच-समझकर अपनी बात रखनी चाहिए।

निराधार आरोपों और सनसनीखेज बयानों से संबंधित नेता की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। राजनीतिक संवाद में तथ्यों और जिम्मेदारी का ध्यान रखना आवश्यक है।

मराठा युवाओं के सवालों की अनदेखी नहीं हो

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा समाज की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए निरुपम ने कहा कि समाज के युवाओं के रोजगार, आरक्षण और कुणबी प्रमाणपत्र से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे की असंतुष्टि को समझने और इन समस्याओं का ठोस समाधान निकालने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि युवाओं की अपेक्षाओं और उनकी समस्याओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

मराठी भाषा का सम्मान, छोटे कारोबारियों का संरक्षण जरूरी

मुंबई शहर में मराठी भाषा का सम्मान बनाए रखने और रोजमर्रा के व्यवहार में इसके अधिकाधिक इस्तेमाल की जरूरत पर निरुपम ने जोर दिया। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव से छोटे कारोबारियों के सामने चुनौतियां पैदा हो रही हैं।

पैकेज्ड दूध बेचने वाली कंपनियों के विस्तार से स्थानीय दूध विक्रेताओं के कारोबार पर पड़ने वाले असर का उल्लेख करते हुए उन्होंने छोटे व्यावसायियों के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता जताई।

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उद्धव ठाकरे पर विचारधारा से दूरी का आरोप

शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का उल्लेख करते हुए निरुपम ने उद्धव ठाकरे की आलोचना की। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व और कांग्रेस का विरोध बालासाहेब ठाकरे की राजनीति की प्रमुख विशेषताएं थीं। निरुपम के अनुसार, मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा के कारण उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ महाविकास आघाड़ी बनाई और बालासाहेब की विचारधारा से दूरी बना ली।

उन्होंने एकनाथ शिंदे के शिवसेना से अलग होने के फैसले को बालासाहेब की विचारधारा को आगे बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया। हालांकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर विभिन्न दलों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं।

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शिक्षक-स्नातक चुनावों में सीधा संपर्क अहम

शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावों पर निरुपम ने कहा कि इन चुनावों का स्वरूप सामान्य चुनावों से अलग होता है। शिक्षकों की लंबित मांगों, स्नातकों के रोजगार संबंधी मुद्दों और स्थानीय समस्याओं को समझने के लिए उम्मीदवारों का मतदाताओं से सीधा संवाद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इन चुनावों में व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक मजबूती और विभिन्न स्तरों पर समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

- नवभारत लाइव के लिए पुणे से समीर सय्यद की रिपोर्ट

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