महाराष्ट्र क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स विधेयक 2026 पर विवाद, जन आरोग्य अभियान ने उठाए निजी अस्पतालों पर सवाल

Maharashtra Health News: महाराष्ट्र सरकार के 'क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स विधेयक-2026' पर जन आरोग्य अभियान ने सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि यह मसौदा मरीजों के अधिकारों को कमजोर करता है।
Controversy over Maharashtra Clinical Establishments Bill: Jan Arogya Abhiyan raises questions about hospitals.
पुणे अस्पताल प्रतीकात्मक तस्वीरसोर्स- सोशल मीडिया
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Maharashtra Clinical Establishments Bill 2026: पुणे में निजी अस्पतालों के नियमन के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत 'क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स विधेयक-2026' का मसौदा विवादों के केंद्र में आ गया है। इस प्रस्तावित कानून पर 'जन आरोग्य अभियान' ने गंभीर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि यह मसौदा मरीजों के हितों की रक्षा करने के बजाय उन्हें हाशिए पर धकेलने वाला है।

अभियान का स्पष्ट मानना है कि यदि यह विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में पारित होता है, तो न केवल मौजूदा शिकायत निवारण तंत्र कमजोर होगा, बल्कि निजी अस्पतालों की मनमानी और अनियंत्रित उपचार शुल्कों पर लगाम लगाना लगभग असंभव हो जाएगा।

विधेयक में मरीजों को शोषण से बचाने का कोई उपाय नहीं

यह विधेयक राज्य में वर्ष 2021 से प्रभावी 'महाराष्ट्र नर्सिंग होम रजिस्ट्रेशन' नियमों का स्थान लेने के लिए लाया गया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि नया मसौदा उन सुरक्षात्मक प्रावधानों को दरकिनार कर रहा है, जो मरीजों को शोषण से बचाने के लिए अनिवार्य हैं। जन आरोग्य अभियान ने जोर देकर कहा है कि किसी भी अस्पताल को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह बिल भुगतान न होने के बहाने मरीज के शव को परिजनों को सौंपने से इनकार करे या मरीज को जबरन बंधक बनाकर रखे। ये अमानवीय प्रथाएं पूरी तरह प्रतिबंधित होनी चाहिए।

मरीजों के मूलभूत अधिकारों का अभाव

इसके अतिरिक्त, विधेयक में मरीजों के मूलभूत अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख न होना एक बड़ी खामी है। एक मरीज का अधिकार है कि उसे अपने उपचार की पूरी जानकारी मिले, जिसमें डॉक्टर की योग्यता, निदान का विवरण और स्पष्ट डिस्चार्ज कार्ड शामिल हो। महिला मरीजों की सुरक्षा के लिए जांच के समय अन्य महिला की उपस्थिति सुनिश्चित करना, एचआईवी संक्रमित मरीजों के लिए उपचार की गरिमा बनाए रखना और पारदर्शिता जैसे आवश्यक प्रावधानों का नए मसौदे में अभाव है।

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अस्पतालों की फीस पर नियंत्रण की जरूरत

  • उपचार की दरों के विषय पर भी यह विधेयक केवल सतही सुधारों की बात करता है। केवल दरों की सूची दीवार पर चस्पा कर देना समाधान नहीं है;

  • आवश्यकता दरों के मानकीकरण की है। ग्रामीण और शहरी परिवेश, अस्पताल की श्रेणी और डॉक्टर की विशेषज्ञता के आधार पर एक तार्किक सीमा तय होनी चाहिए,

  • साथ ही, चिकित्सा प्रक्रियाओं में वैज्ञानिक दिशानिर्देशों को अनिवार्य न करना स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नविहन लगाता है।

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निवारण प्रणाली में सबसे बड़ी विसंगति

विधेयक की सबसे बड़ी विसंगति इसकी शिकायत निवारण प्रणाली में दिखती है। वर्ष 2021 के नियमों के तहत हर अस्पताल में 24 घंटे काम करने वाला एक शिकायत निवारण कक्ष और टोल-फ्री हेल्पलाइन अनिवार्य थी, जो मरीजों को तुरंत न्याय दिलाती थी। नया विधेयक इस त्वरित तंत्र को पूरी तरह हटा देता है, जिससे मरीज असहाय महसूस करेंगे। इस कमी को दूर करने के लिए, अभियान ने मांग की है कि राज्य और जिला स्तर पर एक सुदृढ़ और समयबद्ध शिकायत निवारण ढांचा स्थापित किया जाए। इसमें केवल प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य अधिकार नेटवर्क, महिला संगठन और मरीज हित समूह के प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

20 अगस्त तक भेजे जा सकते हैं सुझाव

जन आरोग्य अभियान ने स्वास्थ्य विभाग से चिकित्सा परिषदों के अलावा नागरिक संगठनों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मरीज हित समूहों के साथ व्यापक चर्चा करने की मांग की है। नागरिकों के सुझाव भेजने की अंतिम तिथि 20 अगस्त 2026 बताई गई है। अभियान के कार्यकर्ता दीपक जाधव ने सरकार से मरीजों के हितों को प्राथमिकता देने की अपील की है।

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