शहीद राजगुरु की अमर गाथा: पुणे के खेड़ से लाहौर जेल तक, जानिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ उनके बलिदान की कहानी

Shivaram Hari Rajguru Martyrdom Story: पुणे के वीर सपूत शिवराम हरि राजगुरु का बलिदान आज भी प्रेरणा देता है। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ उन्होंने देश के लिए फांसी के फंदे को चूमा था।
The Immortal Saga of Martyr Rajguru: From Khed, Pune to Lahore Jail
शिवराम हरि राजगुरुसोर्स- सोशल मीडिया
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Freedom Fighter Rajguru Independence Day Special Story: पुणे के वीर सपूत शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान क्रांतिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भगत सिंह और सुखदेव के साथ राजगुरु को भी फांसी दी गई। तीनों क्रांतिकारियों का बलिदान आज भी देशवासियों के लिए साहस, देशभक्ति और त्याग की मिसाल है।

पुणे की धरती से निकला था क्रांति का यह वीर

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म पुणे जिले के खेड़ में हुआ था, जिसे आज राजगुरुनगर के नाम से जाना जाता है। कम उम्र में ही उनके भीतर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की भावना पैदा हो गई थी। आगे चलकर वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के करीबी सहयोगी बने। राजगुरु निशानेबाजी में बेहद कुशल माने जाते थे। ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

Shivaram Hari Rajguru Bhagat Singh Sukhdev Rajguru, Martyrdom Day 23 March
शिवराम हरि राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव राजगुरुसोर्स- सोशल मीडिया

लाहौर षड्यंत्र केस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मुकदमा था, जिसमें क्रांतिकारी भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर सहित कई क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। इसका संबंध मुख्य रूप से ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या से था।

लाहौर षड्यंत्र केस की पृष्ठभूमि

  • 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए।

  • 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। क्रांतिकारियों ने इसके लिए पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को जिम्मेदार माना और बदला लेने की योजना बनाई। हालांकि गलत पहचान के कारण 17 दिसंबर 1928 को जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या कर दी गई।

इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों की तलाश तेज हो गई। भगत सिंह बाद में 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा बम कांड में बटुकेश्वर दत्त के साथ गिरफ्तार हुए। इसी गिरफ्तारी के बाद पुलिस को सॉन्डर्स हत्याकांड से जुड़े क्रांतिकारियों के बारे में महत्वपूर्ण सुराग मिले।

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शिवराम हरि राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु सोर्स- सोशल मीडिया

विशेष ट्रिब्यूनल का गठन

  • मामले की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से आगे बढ़ रही थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मुकदमे को तेजी से पूरा करने के लिए 1930 में एक विशेष ट्रिब्यूनल गठित किया। इस प्रक्रिया को लेकर क्रांतिकारियों और उनके समर्थकों ने ब्रिटिश सरकार की कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठाए।

  • 7 अक्टूबर 1930 को विशेष ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई। बाद में तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई।

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शिवराम हरि राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु सोर्स- सोशल मीडिया
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पुणे के पिंपरी-चिंचवड़ की सड़कों पर जानलेवा गड्ढे, महानगरपालिका के बारिश वाले तर्क पर भड़के लोग

क्यों महत्वपूर्ण है?

लाहौर षड्यंत्र केस केवल एक कानूनी मुकदमा नहीं था। इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन को देशभर में व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में गिनी जाती है। 23 मार्च को इन्हीं तीनों की स्मृति में शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।

फांसी की तारीख 24 मार्च 1931 निर्धारित थी, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन ने इसे एक दिन पहले ही लागू कर दिया। 23 मार्च 1931 की शाम लाहौर जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई।

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शिवराम हरि राजगुरु, भगत सिंह, सुखदेव राजगुरुसोर्स- सोशल मीडिया

हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमा

तीनों क्रांतिकारियों ने मौत के सामने भी अदम्य साहस दिखाया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमर हो गया। 23 मार्च को आज भी देश में शहीद दिवस के रूप में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को याद किया जाता है।

राजगुरु का जीवन यह संदेश देता है कि आजादी केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे असंख्य युवाओं का त्याग, साहस और सर्वोच्च बलिदान भी था। पुणे की धरती पर जन्मे इस महान क्रांतिकारी का नाम आज भी देशभक्ति और वीरता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है।

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