अजित पवार की फाइल फोटो, (सोर्स- सोशल मीडिया)
Ajit Pawar Name in Irrigation Scam: महाराष्ट्र की राजनीति के ‘दादा’ कहे जाने वाले अजित पवार के विमान दुर्घटना में आकस्मिक निधन ने पूरे राज्य को स्तब्ध कर दिया है। बारामती की मिट्टी से शुरू हुआ उनका सफर वहीं एक त्रासद मोड़ पर खत्म हुआ, जिससे सत्ता के गलियारों में एक गहरा शून्य पैदा हो गया है। आज जब उनके प्रशासनिक कौशल और ‘लाडली बहन’ जैसी योजनाओं की चर्चा हो रही है, तब उनके करियर के साथ जुड़ा 70,000 करोड़ के सिंचाई घोटाले का वह अमिट दाग भी सुर्खियों में है।
हालांकि, जांच एजेंसियों ने क्लोजर रिपोर्ट पेश कर उन्हें राहत दी थी, लेकिन यह विवाद उनके राजनीतिक सफर का वह कड़वा सच रहा जिसने अंतिम समय तक उनका पीछा नहीं छोड़ा।
यह घोटाला 1999 से 2009 के बीच का है, जब अजित पवार महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री थे। आरोप लगा कि 70,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद राज्य की सिंचाई क्षमता में मात्र 0.1% की वृद्धि हुई। परियोजनाओं की लागत को नियमों के खिलाफ जाकर कई गुना बढ़ाया गया और ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। विदर्भ और कोंकण की कई महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाएं भ्रष्टाचार और लेटलतीफी की भेंट चढ़ गईं, जिससे सीधे तौर पर राज्य के किसान प्रभावित हुए।
इस घोटाले का खुलासा 2012 के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट से हुआ। इसके बाद विजय पांढरे जैसे वरिष्ठ अधिकारियों ने सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाए। मामला तब और गरमाया जब जनहित याचिकाएं (PIL) दायर हुईं और बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा श्वेत पत्र जारी करने के फैसले ने इस आग में घी का काम किया, जिससे तत्कालीन गठबंधन सरकार के भीतर भी दरारें आ गई थीं।
2014 के चुनावों में भाजपा के लिए यह सबसे बड़ा मुद्दा था। देवेंद्र फडणवीस ने ‘चक्की पीसिंग’ वाला तंज कसकर अजित पवार को घेरा, तो वहीं पीएम मोदी और अमित शाह ने रैलियों में इसे ’70 हजार करोड़ का महाघोटाला’ करार दिया। पीएम मोदी ने कई बार कहा था कि भ्रष्टाचारियों की जगह जेल में होगी। हालांकि, 2023 में जब अजित पवार भाजपा-नीत महायुति सरकार में शामिल हुए, तो विपक्ष ने इसे भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ राजनीति कहकर निशाना साधा।
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सालों की लंबी जांच और कानूनी खींचतान के बाद, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और अन्य जांच एजेंसियों ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट पेश की। एजेंसियों ने कहा कि उन्हें अजित पवार के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले हैं। हालांकि, ED ने समय-समय पर सहकारी चीनी मिलों से जुड़े मामलों में संपत्ति जब्त कर दबाव बनाए रखा, लेकिन मुख्य सिंचाई घोटाले में क्लीन चिट मिलने को अजित पवार के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देखा गया।
Ans: यह घोटाला 1999 से 2009 के बीच महाराष्ट्र में सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण से जुड़ा है। इसकी कुल राशि 70,000 करोड़ रुपये बताई गई थी।
Ans: अजित पवार 1999 से 2009 तक महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने नियमों को दरकिनार कर ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया।
Ans: घोटाले का एक बड़ा हिस्सा विदर्भ क्षेत्र से जुड़ा था। VIDC के माध्यम से बांटी गई निविदाओं में भारी गड़बड़ी पाई गई थी। चितले समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था।
Ans: 2019 में जब अजित पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, उसके कुछ ही घंटों बाद ACB ने उन्हें सिंचाई घोटाले के 9 मामलों में 'क्लीन चिट' दे दी थी।
Ans: इस घोटाले के कारण महाराष्ट्र की सिंचाई क्षमता में केवल 0.1% की ही वृद्धि हुई। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ा क्योंकि बांध और नहरें अधूरी रह गईं।