

नासिक के सह्याद्रि पर्वतीय क्षेत्र में स्थित यह मंदिर सात विशाल शिखरों से घिरा हुआ है।
भगवान विष्णु के चक्र से सती का दाहिना हाथ गिरने पर यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ बना।
अठारह भुजाओं वाली आदिशक्ति ने इसी पवित्र पर्वत पर भयानक महिषासुर दानव का वध किया था।
Saptashrungi Goddess Mythological Story: महाराष्ट्र के नासिक जिले के कलवण तालुका में वणी के निकट सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला की गगनचुंबी पहाड़ियों पर स्थित सप्तश्रृंगी देवी मंदिर भारतीय आस्था, परंपरा और संस्कृति का एक पावन केंद्र है।
समुद्र तल से लगभग 4,600 से 4,659 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पावन धाम सात विशाल पर्वतीय शिखरों से घिरा हुआ है, जिसके कारण देवी मां को सप्तश्रृंगी निवासिनी (सात शिखरों पर निवास करने वाली देवी) के नाम से जाना जाता है। इस पावन पर्वत क्षेत्र में 108 पवित्र जल कुंड भी स्थित हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती के आत्मदाह के पश्चात भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित होकर सती का दाहिना हाथ इसी स्थान पर गिरा था। इस कारण सप्तश्रृंगी देवी धाम को भारत के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में प्रमुखता से गिना जाता है।
इसके साथ ही, यह मंदिर महाराष्ट्र के प्रसिद्ध 'साढ़े तीन शक्तिपीठों' में से एक है। अन्य तीन पीठ कोल्हापुर की महालक्ष्मी, तुलजापुर की तुलजा भवानी और माहुर की रेणुका देवी हैं। इन चार पीठों को पवित्र ध्वनि ॐ के चार अंशों से जोड़ा जाता है, जहां सप्तश्रृंगी देवी को 'अर्ध शक्तिपीठ' या आदिशक्ति का मूल स्थान माना जाता है जो ॐ की अंतिम ध्वनि का प्रतीक है। एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी का प्राकट्य भगवान ब्रह्मा के कमंडलु से हुआ था, जिसके कारण उन्हें ब्रह्मस्वरूपिणी भी कहा जाता है।
सप्तश्रृंगी देवी की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा महिषासुर दानव के संहार से जुड़ी है। जब महिषासुर नामक असुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था, तब देवताओं की प्रार्थना पर आदिशक्ति ने विशाल रूप धारण किया। समस्त देवों ने देवी को अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए जैसे शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, वरुण का शंख, अग्नि की ज्वालाएं, वायु का धनुष-बाण, इंद्र का वज्र व घंटा, और ब्रह्मा का कमंडलु।
अठारह भुजाओं वाली देवी ने इसी पर्वत पर महिषासुर से भीषण युद्ध करके उसका वध किया और महिषासुर मर्दिनी कहलाईं। पहाड़ी की तलहटी में स्थित पत्थर का भैंसे का सिर इसी पौराणिक विजय का प्रतीक माना जाता है।
सप्तश्रृंगी गढ़ का इतिहास त्रेतायुग और रामायण काल से भी गहराई से जुड़ा हुआ है-
श्री राम और हनुमान जी का आगमन: दंडकारण्य वनवास के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने यहां आकर देवी भगवती के दर्शन किए थे। रामायण युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी मूर्छित हुए थे, तब हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज में इसी पर्वत क्षेत्र (द्रोणागिरी का हिस्सा) में आए थे।
महर्षि मार्कंडेय की तपोभूमि: सप्तश्रृंगी पर्वत के ठीक सामने घाटी के पार मार्कंडेय पहाड़ी स्थित है। मान्यता है कि महर्षि मार्कंडेय ने यहां गुफा में रहकर कठोर तपस्या की थी और देवी की स्तुति में प्रसिद्ध देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) की रचना की थी।
छत्रपति शिवाजी महाराज का दर्शन: मराठा इतिहास की बखर के अनुसार, छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत अभियान के पश्चात यहाँ आकर सप्तश्रृंगी देवी के दर्शन व पूजा-अर्चना की थी।
स्वयंभू प्रतिमा: मंदिर के गर्भगृह में प्राकृतिक चट्टान में उकेरी गई लगभग 8 फीट ऊंची स्वयंभू मूर्ति विराजित है, जो सिंदूर से सुशोभित रहती है।
ऐतिहासिक सीढ़ियां: मंदिर तक पहुंचने के लिए चट्टानों को काटकर लगभग 470 से 500 सीढ़ियां बनाई गई थीं, जिनका निर्माण सन् 1710 में मराठा सेनापति घराने की उमाबाई दाभाड़े ने करवाया था।
कीर्तिध्वज फहराने की परंपरा: चैत्र पूर्णिमा और विजयादशमी की मध्यरात्रि में पर्वत के सबसे ऊंचे और दुर्गम शिखर पर दरेगांव के गवली (पाटील) परिवार द्वारा पारंपरिक ध्वज फहराया जाता है, जो सदियों पुरानी पावन परंपरा है।
पहले श्रद्धालुओं को पहाड़ी की कठिन और सीधी सीढ़ियों से होकर मंदिर तक पहुंचना पड़ता था। वर्ष 2018 में यहां सुयोग गुरबक्षानी फ्यूनिकुलर रोपवेज़ लिमिटेड द्वारा निर्मित भारत की पहली फ्यूनिकुलर रोप-वे सेवा का शुभारंभ किया गया। इस वातानुकूलित ट्रॉली के माध्यम से श्रद्धालु मात्र 3 मिनट में नीचे से मंदिर परिसर तक पहुंच जाते हैं। इस आधुनिक सुविधा से बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांगों के लिए आदिशक्ति के दर्शन अत्यंत सुलभ और सुरक्षित हो गए हैं।