

Nashik Yeola Drought Soybean Maize: नासिक जिले के येवला तहसील में सामान्य से करीब 365.5 मिमी कम बारिश होने से सोयाबीन और मक्का की फसल प्रभावित हुई है। जलस्रोतों का स्तर गिरने के कारण 12 गांवों और 23 ढाणियों में टैंकरों से पेयजल आपूर्ति करनी पड़ रही है।
नासिक जिले के येवला तहसील में इस वर्ष मानसून की शुरुआत से ही किसानों की चिंता बनी हुई है। पिछले दो महीनों में अपेक्षित बारिश नहीं होने से खरीफ फसलों के साथ पेयजल संकट भी गहराने लगा है। पिछले वर्ष की तुलना में तहसील में करीब 365.5 मिलीमीटर कम बारिश दर्ज की गई है।
बारिश की कमी का सीधा असर खरीफ फसलों की वृद्धि पर पड़ा है। तहसील में सोयाबीन और मक्का प्रमुख खरीफ फसलें हैं, लेकिन दोनों फसलों पर बारिश की कमी का असर खेतों में दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो कृषि उत्पादन में गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
बारिश कम होने के साथ ही कुओं, बोरवेल और अन्य जलस्रोतों का जलस्तर भी तेजी से नीचे जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। वर्तमान में तहसील के 12 गांवों और 23 ढाणियों में पेयजल के लिए टैंकरों पर निर्भरता बनी हुई है।
ग्रामीणों की मांग है कि प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों से नियमित और पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जाए। साथ ही मौजूदा जलस्रोतों के संरक्षण और वैकल्पिक जल व्यवस्था पर तत्काल ध्यान दिया जाए, ताकि आने वाले दिनों में संकट और गंभीर होने पर ग्रामीणों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
सरकार की सूखाग्रस्त तहसीलों की सूची में येवला को भी शामिल किया गया है। मंत्री छगन भुजबल और पूर्व सांसद समीर भुजबल ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया है। इसके बाद राजस्व प्रशासन की ओर से फसल नुकसान के पंचनामे शुरू किए गए हैं।
फसल नुकसान के साथ पेयजल और पशुधन के लिए चारे की समस्या भी सामने आ रही है। प्रभावित क्षेत्रों में टैंकर, चारा और जलस्रोतों के प्रभावी प्रबंधन की मांग की जा रही है।
खेती को नुकसान होने के बावजूद दूध व्यवसाय कई किसान परिवारों के लिए आर्थिक सहारा बना हुआ है। येवला तहसील में प्रतिदिन करीब 2 लाख 32 हजार 630 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इससे बड़ी संख्या में परिवारों को नियमित आय मिल रही है।
हालांकि, यदि बारिश की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो पशुओं के लिए चारा और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में किसानों की नजर अब राहत उपायों के साथ-साथ जलस्रोतों और पशुधन के लिए की जाने वाली वैकल्पिक व्यवस्था पर टिकी है।