हरित कुंभ के नाम पर पेड़ों की बलि? पर्यावरण प्रेमियों का विरोध, नासिक मनपा पर गंभीर आरोप

Nashik Tree Cutting Controversy: नासिक में बी.डी. भालेकर स्कूल परिसर में पुराने पेड़ों की कटाई को लेकर विवाद बढ़। पर्यावरण प्रेमियों ने मनपा प्रशासन पर हरियाली नष्ट करने का आरोप लगाते हुए विरोध जताया।
Sacrificing Trees in the Name of 'Green Kumbh'? Environmentalists Protest, Level Serious Allegations Against Nashik Municipal Corporation.
Nashik Environmental Protest( Source: Social Media )
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Nashik Environmental Protest: नासिक एक ओर जहां 'तपोवन बचाओ, नासिक बचाओ' आंदोलन के माध्यम से शहर की हरियाली बचाने की जंग लड़ी जा रही है, वहीं दूसरी ओर मनपा प्रशासन और ठेकेदारों की मिलीभगत से पेड़ों की कटाई का खूनी खेल जारी है।

बी। डी। भालेकर स्कूल और कॉम्रेड अन्नाभाऊ साठे प्रतिमा परिसर में बरसों पुराने 5 विशाल पेड़ों को निर्देयतापूर्वक काट दिया गया, जिससे पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है।

आरोप लगाया जा रहा है कि 'हरित कुंभ' के नाम पर शहर की पहचान बन चुके प्राचीन पेड़ों की बलि दी जा रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मनपा प्रशासन केवल ठेकेदारों की जेबें भरने के लिए पर्यावरण का विनाश कर रहा है।

जहां विदेशों में एक-एक पेड़ बचाने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग होता है, वहीं नासिक में उन्हें जड़ से खत्म किया जा रहा है। यदि यही स्थिति रही, तो नासिक जल्द ही केवल कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो जाएगा और शहर की प्राकृतिक पहचान खो जाएगी।

आज जब कालिदास कला मंदिर के सामने बी. डी. भालेकर मैदान के पास पेड़ों की कटाई शुरू थी, तब सजग नागरिकों ने मौके पर पहुंचकर विरोध किया। जब अधिकारियों से आधिकारिक अनुमति पत्र मांगा गया, तो वे टालमटोल करने लगे और वरिष्ठ अधिकारियों के नाम बताने लगे।

जनता के तीखे सवाल।

कड़े विरोध के बाद अंततः पेड़ों की कटाई को बीच में ही रोकना पड़ा। इस गंभीर मामले पर राजू देसले और पूर्व नगरसेवक राजेंद्र बागुल ने कड़ा रुख अपनाया है।

उन्होंने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। प्रशारान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि आपत्तिया दर्ज होने के चावजूद नियमों को ताक पर रखकर पेड़ काटे जा रहे हैं। पर्यावरण प्रेमियों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी आंखों के सामने शहर के फेफड़ों (पेड़ों) को खत्म होते नहीं देखेंगे।

एक तरफ हम तपोवन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और दूसरी तरफ प्रशासन की मिलीभगत से प्राचीन पेड़ों का कत्लेआम हो रहा है, यह केवल विकास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ खिलवाड़ है।

- आयटक, राज्य सचिव, राजू देसले

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