

ऐतिहासिक विवाद: 1789-1790 में शैव-वैष्णव संतों के बीच संघर्ष।
31 अक्टूबर की आरती: रामकुंड पर मां गोदावरी की आरती।
भक्ति दास की पहल: संतों को एक मंच पर लाने का प्रयास।
संतों का समर्थन: संजय दास महाराज ने पहल का स्वागत किया।
Shaiv Vaishnav Unity Anand Akhada: नासिक सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान शैव संन्यासियों और वैष्णव बैरागी साधुओं के बीच पहले शाही स्नान (अमृत स्नान) के अधिकार और क्रम को लेकर एक भीषण विवाद व खूनी संघर्ष हुआ था, जिसके कारण वैष्णव अखाड़ों को त्र्यंबक से अलग होना पड़ा था। यह ऐतिहासिक टकराव वर्ष 1789-1790 के कुंभ मेले के दौरान हुआ था।
शैव संप्रदाय (जो भगवान शिव के उपासक हैं) और वैष्णव संप्रदाय (जो भगवान विष्णु के उपासक हैं) के साधु इस बात पर भिड़ गए कि कुशावर्त कुंड (त्र्यंबकेश्वर) में सबसे पहले स्नान कौन करेगा। इसी घटना के बाद नासिक कुंभ मेले के दौरान कभी भी स्नान से लेकर कार्यक्रमों तक में सन्यासी और बैरागी संप्रदाय के साधु संत एक साथ एक मंच पर नहीं दिखे।
लेकिन इस बात का कुंभ मेला ऐतिहासिक होने जा रहा है और उसकी शुरुआत भी अपने आप को इतिहास के पन्नों के साथ-साथ अखाड़े की दुनिया में भी स्वर्ण अक्षरों से अंकित होने वाली है। अवसर होगा 31 अक्टूबर की गोदावरी के पवित्र पावन तट रामकुंड में गोमुख गोदावरी मंदिर के प्रांगण में देश की महामहिम राष्ट्रपति की गरिमामय मौजूदगी में मां गंगा गोदावरी की आरती अपने आप में दिव्य अलौकिक ऐतिहासिक बनने वाली है।
दोनों पक्षों के बीच यह टकराव इतना उग्र हो गया कि इसमें हजारों साधुओं (दस्तावेजों के अनुसार लगभग 12,000) की जान चली गई। इस बड़े रक्तपात को रोकने और भविष्य में शांति बनाए रखने के लिए तत्कालीन मराठा शासक पेशवा सवाई माधवराव ने एक आधिकारिक आदेश जारी किया।
शैव अखाड़े: भगवान शिव के उपासक नागा और शैव साधुओं को त्र्यंबकेश्वर (कुशावर्त कुंड) में ही स्नान करने की अनुमति दी गई। वैष्णव अखाड़े: वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों (दिगंबर, निर्मोही और निर्वाणी) को त्र्यंबकेश्वर से करीब 30 किलोमीटर दूर नासिक शहर में गोदावरी नदी के रामकुंड पर स्नान करने के लिए स्थानांतरित कर दिया गया।
सिंहस्थ कुंभ मेले के इस ऐतिहासिक क्षण को लाने के पीछे तीनों वैष्णो आणि अखाड़े के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत भक्ति दास महाराज जी की प्रमुख भूमिका रही है आरती की रूपरेखा बनाने से लेकर त्रयंबकेश्वर स्थित सन्यासियों के सभी दसों अखाड़े में जाकर पड़ती का निमंत्रण पत्र पहुंचने तक की भूमिका निभाने वाले भक्ति दास महाराज जी का कहना है कि उन्हें खुशी है कि उनकी सकारात्मक पहल अब ऐतिहासिक बनने वाली है। वहीं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद रजिस्टर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय दास महाराज जी ने भी इस प्रयास का स्वागत किया है।