

Mythological Importance Of Nashik: देशभर में चार पवित्र स्थान पर देवताओं और असुरों में कुंभ के घड़े को छीना झपटी के दौरान घड़े से अमृत की कुछ बुदे गिर गई थी जहां पर अमृत स्नान करके जन्म जन्मांतर से मुक्ति पाने के लिए कुंभ स्नान की परंपरा पड़ी प्रयागराज हरिद्वार उज्जैन का तो अपना अलग धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है लेकिन इतिहास के पन्नों में नासिक का स्थान अत्यंत गौरवशाली, पौराणिक और ऐतिहासिक रहा है।
जहां पर गौतम ऋषि को गाय के हत्या के दोष से मुक्त करने के लिए मां गंगा को गोदावरी के रूप में आना पड़ा और इसी पावन पवित्र कल कल बहती गोदावरी के तट पर बसा यह शहर केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास के विभिन्न कालखंडों का जीवंत दस्तावेज है। और जब एक बार फिर सिंहस्थ कुंभ का 31 अक्टूबर 2026 से आगाज होने वाला है और इस बात का यह कुंभ अपने आप में इसलिए भी महत्वपूर्ण है की पहली बार महाराष्ट्र सरकार के द्वारा इस कुंभ के प्रचार प्रसार और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ विभिन्न आकारों संतों महंतों विभिन्न पंथ संप्रदाय के लिए भारी भरकम बजट का प्रावधान भी किया गया है जिसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस बार का यह कुंभ अपने धार्मिक ऐतिहासिक गौरवशाली पौराणिक परंपराओं के इस शहर को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान देगा तो गलत नहीं है।
वैसे वर्तमान में पूरे देश भर में सनातन की धार्मिक मान्यताओं का बोलबाला है और यहां तो पूरे ब्रह्मांड में एक एकमात्र शहर नगर त्रंबकेश्वर है जहां पर शिवलिंग के रूप में साक्षात ब्रह्मा विष्णु महेश जिन्हें त्रिदेव भी कहा जाता है विराजमान है।
शूर्पणखा की नासिका: रामायण काल में नासिक को 'पंचवटी' के नाम से जाना जाता था। मान्यता है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने 14 वर्षों के वनवास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यहीं बिताया था। इसी स्थान पर लक्ष्मण जी ने रावण की बहन शूर्पणखा की नाक (संस्कृत में नासिका) काटी थी, जिसके बाद इस स्थान का नाम 'नासिक' पड़ा।युगों के अनुसार नासिक का नाम हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में इसे 'पद्मनगर', त्रेतायुग में 'त्रिकंटक', द्वापरयुग में 'जनस्थान' और कलियुग में 'नवशिख' या 'नासिक' कहा गया।
पांडवलेनी गुफाएं: इसी काल के दौरान (पहली शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच) यहां बौद्ध भिक्षुओं के लिए प्रसिद्ध 24 गुफाओं का निर्माण हुआ, जिन्हें आज 'पांडवलेनी' कहा जाता है।
सन् 1487 के बाद यह क्षेत्र मुग़ल शासन के अधीन आ गया। मुग़ल काल (विशेषकर औरंगाबाद और अकबर के समय) के दौरान इसकी खूबसूरती और गुलाब के बगीचों के कारण इसका नाम बदलकर 'गुलशनाबाद' (फूलों का शहर) कर दिया गया था।
सम्राट अकबर ने अपनी पुस्तक 'आईन-ए-अकबरी' में भी नासिक का विस्तार से उल्लेख किया है। 18वीं शताब्दी में पेशवाओं ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण प्राप्त किया और इसका नाम फिर से 'नासिक' बहाल किया। पेशवाओं के शासनकाल में गोदावरी के तटों पर कई सुंदर घाटों और भव्य मंदिरों (जैसे कालाराम मंदिर) का निर्माण व जीर्णोद्धार हुआ।
नासिक का इतिहास सिंहस्थ कुंभ मेले के बिना अधूरा है। देश के उन 4 पवित्र स्थानों में से नासिक एक है जहां हर 12 वर्ष में कुंभ मेले का विशाल आयोजन होता है, जिसमें दुनिया भर से करोड़ों श्रद्धालु गोदावरी नदी में आस्था की डुबकी लगाने आते है।
यहां पर विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि कुंभ मेले के ही कारण नासिक शहर की पहचान आज आधुनिक सनातन समाज में प्रमुखता से बना हुआ है और जैसे-जैसे कुंभ मेले का स्वरूप विशाल होता जा रहा है उसको देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में नासिक अपने कुंभ मेले के ही कारण पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल होगा।