नासिक में जल संकट, भीषण गर्मी का असर; जंगल छोड़ बस्तियों में पहुंच रहे वन्यजीव

Nashik Wildlife Water Crisis: नासिक में भीषण गर्मी से जलस्त्रोत सूखने लगे हैं। पानी की तलाश में वन्यजीव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे संघर्ष का खतरा बढ़ गया है।
Water Crisis in Nashik: Impact of Scorching Heat; Wildlife Leaving Forests and Entering Human Settlements
वन्यजीव जल संकट( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Nashik Human Animal Conflict: नासिक जिले में भीषण गर्मी का प्रकोप बढ़ने के साथ ही जंगलों के प्राकृतिक जलस्त्रोत सूखने लगे हैं। पानी की भारी किल्लत के कारण वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है।

प्यास से बेहाल जंगली जानवर अब पानी की तलाश में तेजी से मानव बस्तियों और रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ गया है।

जिले की विभिन्न तहसीलों में वन्यजीवों को बचाने के लिए प्रशासनिक और स्थानीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं- मालेगांवः वन परिक्षेत्र में 14 स्थानों पर कृत्रिम जलकुंड तैयार किए गए हैं, जिन्हें टैंकरों के माध्यम से भरा जा रहा है।

हाल ही में आधार-चिंचवड क्षेत्र में पानी की तलाश में निकले 2 लकड़बग्घों की मौत की दुखद घटना सामने आई है। चांदवडः यहां के वडनेरभैरव, मेसनखेड़े और राजदेरवाड़ी क्षेत्रों में ग्रामीणों ने श्रमदान के माध्यम से पुराने प्लास्टिक ड्रम और कुंडों का उपयोग कर जानवरों के लिए पानी की व्यवस्था की है।

येवलाः यहां वन्यजीव संरक्षण के लिए सोलर बोरवेल जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग कर जलकुंडों में पानी की आपूर्ति की जा रही है। सिन्नरः हिवरे, चास, ठाणगांव और जामगांव जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कृत्रिम जलकुंड तैयार किए गए हैं।

अफसरों ने लोगों से की सतर्क रहने की अपील

वन परिक्षेत्र अधिकारी गायत्री सोनवणे और शेखर देवकर ने नागरिकों से अपील की है कि वे जंगल में लापरवाही से आग न लगाएं, वन संरक्षक राहुल घुगे ने बताया कि विभाग का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों को गांवों की ओर जाने से रोकना है। पर्यावरण प्रेमियों ने मांग की है कि कृत्रिम जलकुंडों की संख्या बढ़ाई जाए और उनमें पानी की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।

वनाग्नि (जंगल की आग) का बढ़ा खतरा

गर्मी के कारण सूखी घास और बढ़ते तापमान से जंगलों में आग लगने की घटनाए भी बढ़ी है, जिससे वन्यजीव असुरक्षित महसूस कर रहे हैं-आग को रोकने के लिए संवेदनशील स्थानों पर "जलपट्टे' (फायर लाइन) तैयार किए गए है।

निफाड, त्र्यंबकेश्वर और अन्य क्षेत्रों में आग बुझाने के लिए कुल 18 से अधिक (निफाड में 3 और अन्य क्षेत्रों में 15) 'फायर ब्लोअर मशीन' उपलब्ध कराई गई है, पेठ और त्र्यबकेश्वर के पहाड़ी इलाकों में आग से दुर्लभ जड़ी-बूटियों और पशु-पक्षियों को भारी नुकसान हो रहा है। स्थानीय किसानों के अनुसार, यह आग अब खेतों और आम के बगीचों तक भी पहुँच रही है,

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