

Nagpur Water Scheme Scam: सरकारी योजनाओं का असली फायदा जनता को मिले न मिले, लेकिन भ्रष्ट अफसरों और ठेकेदारों की जेबें जरूर भर जाती हैं। नागपुर जिले की धापेवाड़ा जलापूर्ति योजना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। 'हर घर नल, हर घर जल' के नारे की आड़ में ऐसा खेल रचा गया कि आम इंसान हैरान रह जाए। कागजों पर योजना का काम पूरा दिखाकर करोड़ों रुपये बांट लिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण आज भी पुरानी और बदहाल पाइपलाइन से दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
मंजूर शुदा प्रशासनिक प्रस्ताव के तहत गांव में 9,000 मीटर नई पाइपलाइन बिछाई जानी थी, लेकिन मौके पर सिर्फ 7,000 मीटर पाइपलाइन बिछाकर पूरी रकम का भुगतान उठा लिया गया। सवाल यह उठता है कि आखिर 2,000 मीटर पाइपलाइन का बजट किसकी शह पर और किसकी जेब में गया? यह महज प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर नागपुर की जनता के पैसों पर मारा गया डाका है, जिसे लंबे समय तक सिस्टम के जिम्मेदारों ने दबाए रखा।
बिना नल लगाए डकार गए पूरा बिल
हाई कोर्ट की सख्ती के बाद जब 5 सदस्यीय जांच समिति ने फाइलों की परतें उधेड़ीं, तो भ्रष्टाचार का एक और बदबूदार सच सामने आया। जिन घरों में नल कनेक्शन का काम अधूरा पड़ा था, वहां पुराने उपभोक्ताओं के नाम पर फर्जी एंट्री करके पूरे बिल पास करा लिए गए। जूनियर इंजीनियर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक की सरपरस्ती में यह पूरा फर्जीवाड़ा चलता रहा। अगर स्थानीय सदस्य दिवाकर कड़ ने अदालत का दरवाजा न खटखटाया होता, तो यह घोटाला फाइलों के ढेर में हमेशा के लिए दफन हो चुका होता।
अधिकारियों की लीपापोती पर उठे तीखे सवाल
मामला उजागर होने के बाद अब जिला परिषद प्रशासन कनिष्ठ अभियंता, उप अभियंता और ठेकेदार को सिर्फ शो-कॉज नोटिस थमाकर अपना पल्ला झाड़ने में जुटा है। वहीं कागजों पर आंख बंद करके हस्ताक्षर करने वाले सरपंच और ग्राम सचिव पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है। जनता अब खुलकर सवाल पूछ रही है कि क्या महज नोटिस जारी करना ही इस करोड़ों की लूट की सजा है, या फिर इन भ्रष्ट चेहरों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा?