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RTMNU में कई जांच और अध्ययन समितियों की प्रगति को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
39 PG विभागों में बनी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार है।
लंबित न्यायालयीन मामलों से प्रभावित कामकाज की समीक्षा के लिए भी समितियां गठित की गई।
Nagpur University Inquiry Committees: राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली हमेशा चर्चा में रही है। विविध मांगों की जांच और अध्ययन के लिए बनीं करीब दर्जनभर से अधिक समितियां अब भी फाइलों में बंद हैं। किसी कमेटी की बैठक नहीं हुई तो किसी का एजेंडा ही तय नहीं हुआ है। यही वजह है कि वस्तुस्थिति उजागर नहीं हो रही है। इससे प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
नागपुर विश्वविद्यालय के 39 स्नातकोत्तर विभाग हैं। वहीं 3 संचालित कॉलेज भी हैं। प्रशासन ने सभी को ऑटोनॉमस बना दिया है। इनमें विभागों में स्थिति, प्राध्यापकों की कमी, छात्रों की कमी और छात्र की संख्या बढ़ाने के लिए पिछले वर्ष सीनेट की बैठक में फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई थी। अब तक कमेटी का काम आगे ही नहीं बढ़ पाया है।
यही वजह है कि कई विभागों में प्रवेश क्षमता की तुलना में आधे भी प्रवेश नहीं हो सके है। विवि के अनेक मामले न्यायालय लंबित हैं। साथ ही समय-समय पर छात्रों द्वारा भी याचिका दाखिल की जाती है। प्रलंबित मामलों की मौजूदा स्थिति और निराकरण के लिए कमेटी बनाई गई थी। इसी तरह अधिकारियों की कमी से प्रभावित होने वाले कामकाज की समीक्षा करने के लिए भी कमेटी बनाई गई थी।
तत्कालीन स्पोर्ट्स संचालक शरद सूर्यवंशी द्वारा की गई आर्थिक अनियमितता की जांच के लिए एक नहीं बल्कि 2 कमेटियां बनाई गई थीं। अब तक सच्चाई बाहर नहीं आ सकी है, जबकि सूर्यवंशी सेवानिवृत्त हो गये।
ऑनलाइन परीक्षा कामकाज करने वाले कोएम्प्ट कंपनी को लेकर भी कमेटी गठित हुए वर्षभर से अधिक समय हो गया है लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी है। कमेटियों का गठन तो पूरे उत्साह के साथ किया जा रहा है लेकिन लगभग सभी कमेटियां फाइलों में ही बंद हैं।
इच्छाशक्ति का अभाव कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन या संबंधित
अधिकारियों द्वारा संवेदनशील मामलों की जांच में रुचि न लेना या टालमटोल की नीति अपनाना।
समन्वय की कमी विभिन्न विभागों या कमेटियों के सदस्यों के बीच आपसी तालमेल न होने के कारण बैठकों का एजेंडा तय नहीं हो पाता।
कई मामलों में राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के कारण भी फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, ताकि किसी की जवाबदेही तय न करनी पड़े।
कर्मचारियों और संसाधनों की कमी जाच समितियों के पास
प्रशासनिक अमले की कमी होना भी फाइलों के लंबित रहने का एक कारण बनता है।
जिन मामलों या शिकायतों (जैसे वित्तीय अनियमितताएं, शैक्षणिक भ्रष्टाचार, या अन्य विवाद) की जांच के लिए ये कमेटियां बनाई जाती हैं, समय पर न्याय न मिलने से पीड़ितों का भरोसा उठ जाता है।
दोषियों के हौसले बुलंद : कार्रवाई न होने के कारण अनियमितताएं करने वालों को एक तरह से मौन संरक्षण मिल जाता है।
पारदर्शिता पर सवाल विश्वविद्यालय की साख और शैक्षणिक माहौल पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।