जब होमगार्ड ही संभालेंगे सड़क, तो क्या करेगी ट्रैफिक पुलिस? नागपुर की यातायात व्यवस्था पर गंभीर सवाल

Nagpur Traffic Homeguards: नागपुर में 22 लाख वाहनों के बीच ट्रैफिक व्यवस्था का जिम्मा होमगार्ड संभाल रहे हैं, जबकि कई चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी कम नजर आती है।
Nagpur's traffic management
नागपुर ट्रैफिक पर कि होमगार्ड तैनातीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Nagpur Traffic Police Manpower Shortage: नागपुर शहर में बढ़ती वाहनों की संख्या, भीड़भाड़ वाले बाजार, अस्पताल क्षेत्र और प्रमुख सड़कों पर यातायात के बढ़ते दबाव को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस के सहयोग के लिए होमगार्ड को मैदान में उतारा गया। अब हाल ये है कि पूरी व्यवस्था ही होमगार्ड के भरोसे चल रही है वहीं यातायात पुलिस की बल्ले-बल्ले हो गई है। शहर के अधिकांश चौराहों और मागों पर होमगार्ड ही व्यवस्था संभालते दिखते हैं वहीं यातायात पुलिस नदारद रहती है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब होमगार्ड को ही व्यवस्था संभालनी है तो फिर यातायात पुलिस क्या करेगी? यदि संख्या की बात की जाए तो लगभग 22 लाख वाहन नागपुर सिटी में रजिस्टर्ड हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि यातायात व्यवस्था संभालने के लिए बड़े पैमाने पर मनुष्यबल की जरूरत पड़ेगी लेकिन वाहनों की संख्या के हिसाब से सिटी के यातायात विभाग में पुलिस अधिकारी और कर्मचारियों की भारी कमी है।

वर्तमान में अधिकारियों की संख्या 600 से 650 के करीब है। उस पर हर सप्ताह शहर में मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सहित अन्य वीआईपी के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। अब उनकी आवाजाही के दौरान तो यातायात व्यवस्था सुचारु रखना आवश्यक है, इसीलिए मार्च महीने में पूर्व डीसीपी ट्रैफिक लोहित मतानी ने व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नया मॉडल लाया जिसमें यातायात पुलिस के सहयोग के लिए होमगार्ड की भी तैनाती की गई। हर पॉइंट पर यातायात पुलिस के साथ होमगार्ड की तैनाती से यातायात सुधरने का ख्वाब देखा गया था।

मैनेजमेंट नहीं तो कैसे सुधरेगी ट्रैफिक व्यवस्था

600 पुलिसकर्मियों के साथ 500 होमगार्ड भी मैदान में उतारे गए। मतलब मनुष्यबल की संख्या लगभग दोगुना हो गई। तब यातायात व्यवस्था में सुधार तो होना ही चाहिए लेकिन शहर की हालत ऐसी दिखाई नहीं देती। ट्रैफिक की समस्या जस की तस बनी हुई है। जिन मागों पर यातायात बाधित होता था उन मार्गों पर आज भी वहीं हाल है।

जब ट्रैफिक का मैनेजमेंट ही नहीं होगा तो व्यवस्था सुधरेगी भी नहीं। विशेषतौर पर शाम के वक्त, जब सभी सरकारी और निजी कार्यालयों से कर्मचारी और कॉलेज से स्टूडेंट्स को घर लौटने होता है। ट्रैफिक का फ्लो अचानक बढ़ जाता है।

बड़ी संख्या में रास्तों पर वाहन आने से बाधा निर्माण होती है। ऐसे समय पर ट्रैफिक सिग्नल के भरोसे काम नहीं चल सकता। सभी चौराहों और मुख्य जंक्शन पर पुलिस को मैनुअली ट्रैफिक व्यवस्था संभालना चाहिए लेकिन पुलिस तो केवल चालान बनाने में व्यस्त है।

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बेरोजगार युवा बने सहायक

होमगार्ड को फील्ड पर उतारने की पहल का एक सामाजिक पहलू भी था लेकिन ट्रैफिक पुलिस ने पूरा भार उन पर ही डाल दिया है। ट्रैफिक पुलिस के साथ काम करने वाले कई होमगार्ड बेरोजगार युवा हैं जो सेना, राज्य पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं में भतीं की तैयारी कर रहे हैं।

पुलिस के साथ काम करने से उन्हें लोकसेवा का प्रत्यक्ष अनुभव, अनुशासन और सार्वजनिक प्रबंधन का प्रशिक्षण मिलता है। साथ ही उन्हें मानधन भी दिया जाता है जिससे स्थायी नौकरी मिलने तक उन्हें आर्थिक सहारा मिले, परंतु अब इन युवाओं के भरोसे ही काम चल रहा है।

केवल चालान से नहीं बनेगी बात

जिन्हें सहयोग के लिए लाया गया था अब पूरा भार उन्हीं पर आ गया है, जबकि जिन पर यातायात व्यवस्था सुधारने की प्राथमिक जिम्मेदारी है वे केवल चालान कार्रवाई में जुटे हुए है। यदि चालान कार्रवाई करने से शहर की यातायात व्यवस्था सुधर जाती तो बात ही क्या थी।

पिछले कई सालों से पुलिस हर वर्ष लगभग 10 लाख चालान कार्रवाई करती आ रही है।सूत्रों की मानें तो अब भी 25 लाख से ज्यादा चालान पेंडिंग हैं। वाहन चालकों ने चालान का भुगतान ही नहीं किया। अब इतनी कार्रवाई के बाद तो वाहन चालकों को सुधर जाना चाहिए था लेकिन नागरिकों के मन में यातायात पुलिस के प्रति रोष हमेशा रहता है। आम नागरिकों को भी लगता है कि पुलिस यातायात व्यवस्था सुधारने की बजाय चालान पर ही जोर देती है।

-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से अभिषेक तिवारी की रिपोर्ट

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