हाईलाइट
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की नाराजगी का शिकार जगदीप धनखड़ को बड़ा मंच देकर संघ का नया राजनीतिक संदेश
कभी संघ के दिग्गज नेताओं में रहे सुरेश सोनी की भाजपा में बढ़ती भूमिका से असहज है संघ
सुरेश सोनी को भाजपा में दखल बंद करने की सलाह पहले भी कई बार दे चुके हैं संघ प्रमुख
RSS-Dhankhar Nagpur Political Message : दशहरा उत्सव हमेशा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बड़ा कार्यक्रम होता है। पूरी दुनिया की नजर संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण पर होती है कि वह किस दिशा में बोलेंगे। इस बार भी लोग उम्मीद लगाए बैठे कि संघ प्रमुख मोहन भागवत भाजपा के अंदर मचे हुए कलह पर बोलेंगे। इन कयासों के पीछे सबसे बड़ी वजह कार्यक्रम में बतौर अतिथि देश के पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का शामिल होना ही था। आखिर क्यों संघ भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को आंख दिखाने वाले जयदीप धनखड़ को मंच दे रहा है?
भाजपा में किसकी चलती है-सरकार की, पार्टी संगठन की या संघ के उन चेहरों की, जिनकी जड़ें दोनों संगठनों में गहरी रही हैं? सुरेश सोनी की भाजपा में लगातार बढ़ती भूमिका और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को संघ के मंच पर जगह मिलने के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है। लेकिन क्या इन दोनों घटनाक्रमों का आपस में कोई संबंध है? क्या संघ भाजपा में सुरेश सोनी के बढ़ते प्रभाव से असहज है? क्या धनखड़ को मंच पर बुलाना किसी को राजनीतिक संदेश देने की रणनीति थी? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए संघ और भाजपा के पुराने रिश्तों को समझना जरूरी है।
सुरेश सोनी: बढ़ता दखल, असहज संघ और बिगड़ते रिश्ते
संघ की टॉप लीडरशिप में रहे सुरेश सोनी की भूमिका पर सवाल का सबसे अहम पहलू यही है। क्या वे भाजपा के फैसलों में पहले से ज्यादा सक्रिय हैं, या उनका प्रभाव पुराने संगठनात्मक संपर्कों का परिणाम है? भाजपा में संघ की पृष्ठभूमि वाले नेताओं की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों, संगठनात्मक बदलावों और नेताओं के बीच मध्यस्थता में किसी व्यक्ति की भूमिका कितनी है, यह अलग सवाल है। मध्यप्रदेश में राजनीतिक फैसलों में सुरेश सोनी का सीधा दखल उन्हें विवादित बनाता जा रहा है।
आखिर क्यों दखल के लिए किया गया था मना
सुरेश सोनी को कई बार संघ प्रमुख मोहन भागवत सीधे तौर पर साफ कह चुके हैं कि वह भाजपा में दखल देना बंद करें। संघ और भाजपा के बीच समन्वय का जिम्मा अब उनके पास नहीं है। लेकिन इसके बाद भी सुरेश सोनी लगातार भाजपा के भीतर कई बड़े फैसलों के पीछे देखे जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री चयन से लेकर पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का दतिया से टिकट कटवाने से लेकर कई मामलों में उनका नाम सामने आता रहा है। कई बार मध्यप्रदेश सरकार के मुश्किल वक्त में वह समन्वयक की भूमिका में भी नजर आ जाते हैं। पिछले दिनों चित्रकूट, रीवा की मुलाकातें चर्चा में आई थीं।
दिल्ली क्यों सुरेश सोनी को तवज्जो दे रहा?
अगर संघ की परेशानी पर बात करें तो वह इससे असहज है कि क्यों दिल्ली दरबार सुरेश सोनी को हद से ज्यादा महत्व दे रहा है। क्या भाजपा का दिल्ली दरबार संघ को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहा है। भाजपा और संघ के भीतर समन्यव का एक तरीका है, उसको छोड़कर क्यों सुरेश सोनी के हिसाब से फैसले हो रहे हैं? ऐसे में सवाल उठ सकता है कि भाजपा के फैसलों में संघ के दूसरे नेताओं की भूमिका कहां तक होनी चाहिए और संगठन के भीतर प्रभाव का संतुलन कैसे कायम रखा जाए। यह विवाद मंत्री पीयूष गोयल के घर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुरेश सोनी की मुलाकात के बाद ज्यादा गर्म हो गया है। दरअसल, संघ को सुरेश सोनी का भाजपा के भीतर ज्यादा दखल उस वक्त भी पसंद नहीं आया था, जब उनके पास भाजपा और संघ के बीच समन्वय का जिम्मा था। इसीलिए उन्हें अचानक से पद मुक्त करके धीरे से स्टडी लीव पर भेज दिया गया था।
धनखड़ को मंच: महज आमंत्रण या राजनीतिक संकेत?
जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था। उनके अचानक इस्तीफे ने कई राजनीतिक सवाल खड़े किए। सबसे बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाराजगी बताई गई। उसका खामियाजा भी धनखड़ ने भुगता। उन्हें वह विदाई नहीं दी गई जो एक उपराष्ट्रपति को पद से जाने के बाद मिलती है। संघ के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी समारोह में धनखड़ को आमंत्रित किया जाना इसलिए चर्चा का विषय बना। क्या यह एक पूर्व उपराष्ट्रपति को सम्मान देने की पहल भर थी? क्या संघ अपनी स्वतंत्र सार्वजनिक पहचान को रेखांकित करना चाहता था? या फिर इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक संदेश था, वह भी उस वक्त में जब भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है? क्या संघ धनखड़ के बहाने भाजपा की शीर्ष टीम को आंखें दिखाना चाह रहा है? दरअसल, संघ और भाजपा के रिश्तों में असली सवाल किसी एक व्यक्ति की मौजूदगी या अनुपस्थिति से बड़ा है। सवाल यह है कि राजनीतिक फैसलों में निर्वाचित नेतृत्व, पार्टी संगठन और संघ की पृष्ठभूमि वाले अनुभवी पदाधिकारियों के बीच शक्ति-संतुलन कैसे कायम रहे।