

Nagpur RSS VVIP Security Cost: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को उपलब्ध कराई जा रही वीवीआईपी सुरक्षा पर सरकारी खर्च को लेकर कानूनी विवाद अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता ललन किशोर सिंह ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ द्वारा उनकी जनहित याचिका (पीआईएल) खारिज किए जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है। इस याचिका में केंद्र सरकार से लेकर महाराष्ट्र सरकार तक कई पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय, सीआईएसएफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और महाराष्ट्र सरकार के वित्त विभाग को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि आरएसएस एक पंजीकृत संस्था नहीं है, इसके बावजूद उसकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के लगभग 150 जवान तैनात किए गए हैं।
उनका आरोप है कि इस सुरक्षा व्यवस्था पर सरकारी खजाने से हर महीने करीब 1.25 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि अब तक इस पर कुल खर्च लगभग 200 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि करदाताओं के पैसे से किसी निजी संस्था या गैर-सरकारी संगठन की सुरक्षा का खर्च उठाना उचित नहीं है। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के 27 फरवरी 2023 के एक फैसले (केंद्रीय गृह मंत्रालय बनाम विकास शाह व अन्य) का हवाला दिया गया है। उस निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि निजी व्यक्तियों या गैर-सरकारी संगठनों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुरक्षा का खर्च संबंधित व्यक्ति या संस्था को स्वयं वहन करना चाहिए, न कि सरकार को।
ललन किशोर सिंह ने अपनी एसएलपी में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के 20 अप्रैल के आदेश को रद्द करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि मामले पर नए सिरे से विचार करने के निर्देश दिए जाएं और संबंधित पक्षों से आरएसएस की सुरक्षा व्यवस्था का पूरा विवरण मांगा जाए।
याचिका में अदालत से यह भी आग्रह किया गया है कि प्रतिवादी सुरक्षा व्यवस्था पर होने वाले मासिक 1.25 करोड़ रुपये के खर्च, अब तक हुए करीब 200 करोड़ रुपये के कुल व्यय, आरएसएस को सुरक्षा प्रदान किए जाने के लिए किए गए खतरे के आकलन (थ्रेट असेसमेंट) तथा इस पूरी व्यवस्था का आधिकारिक वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें।
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन रहेगा। यदि शीर्ष अदालत इस याचिका पर सुनवाई स्वीकार करती है, तो सरकारी खर्च पर निजी संस्थाओं को दी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था और उससे जुड़े नियमों पर व्यापक कानूनी बहस होने की संभावना है।