नागपुर में महंगे हो रहे फ्लैट्स, NIT और RERA की लेटलतीफी की मार, बिल्डर्स के छूटे पसीने 

Nagpur Real Estate News: नागपुर में प्रोजेक्ट अप्रूवल और रेरा रजिस्ट्रेशन में 1 साल तक की देरी से रियल एस्टेट सेक्टर प्रभावित हो रहा है। लेटलतीफी के चलते फ्लैट्स महंगे होने की आशंका है।
Nagpur Municipal Corporation NIT Project Approval
लेटलतीफी के चलते फ्लैट्स महंगेप्रतीकात्मक तस्वीर, सोर्स: AI
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Nagpur Municipal Corporation NIT Project Approval: महाराष्ट्र सरकार अपने आपको गतिमान बनाने का प्रयास रही है। मुख्यमंत्री से लेकर पालक मंत्री तक प्रक्रियाओं में तेजी लाने का दंभभरते रहते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अब भी इससे उलट है। मुख्यमंत्री और पालक मंत्री के दावों की पोल मनपा, एनआईटी और रेरा के अधिकारी 'खोल' रहे हैं।

इन विभागों में फाइल जमा करने के बाद एक-एक वर्ष तक प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं मिल पा रही है। नतीजतन एक ओर जहां प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाती है वहीं बिल्डरों को अतिरिक्त रूप से व्याज भरते रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

अगर सरकारी तंत्र 'फास्ट' हो जाए तो ग्राहकों को कम कीमत पर फ्लैट मिल सकता है वहीं कम समय में उनका क्षेत्र के सपना पूरा हो सकता है। जानकारों का कहना है कि आज भी नागपुर सुधार प्रन्यास (एनआईटी) और मनपा की स्थिति आज भी जस की तस है।

जनवरी में अगर कोई प्रोजेक्ट मंजूरी के लिए जमा करता है तो उसे पूरे वर्ष तक इंतजार करना पड़ता है। इसके बाद भी मंजूरी नहीं मिल पाती है। बिल्डरों का कहना है कि वर्तमान दौर में एक अच्छे प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए एक-एक बिल्डर 5 से 10 करोड़ रुपये जमा कर रहे हैं।

बावजूद इसके समय पर मंजूरी नहीं मिलती है। एक ओर सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग की बात करती है वहीं विलंब से लागत बढ़ाने में कर्मचारी अपना पूरा-पूरा योगदान कर रहे हैं।

रेरा में लगने लगा 3-4 माह क्रेडाई

नागपुर जिले के पूर्व अध्यक्ष गौरव अग्रवाला कहते हैं कि पहले तो दो विभाग से ही बिल्डर परेशान थे लेकिन अब रेरा जैसी संस्थान से बिल्डर परेशान होने लगे हैं। अब यह पर भी 'अलग' खेल चालू हो गया है, जिसके कारण प्रोजेक्ट को मंजूरी

मिलने में 3-4 माह लगने लगा है। यह कार्य पहले 1 माह में हो जाता था। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्रक्रिया होने के बाद भी रेरा में 'दलाल' सक्रिय होने लगे हैं। इसके प्रवेश के कारण ही पूरे तंत्र को नुकसान होने लगा है।

अस्थायी नंबर को स्थायी करे रेरा

उनका कहना है कि एक बिल्डर करोड़ों में जमीन लेता है। इसके बाद प्रोजेक्ट मंजूरी के लिए संबंधित विभागों में फाइल डाला जाता है। यहां पर भी करोड़ों भरने के बाद मंजूरी कब मिलेगी इसकी जानकारी किसी को नहीं रहती। भाग्य अच्छा होने पर एक साल में मंजूरी मिलती है, मंजूरी मिलने के बाद बिल्डर रेरा में अप्लाई करता है।

अप्लाई करने के बाद यहां पर फाइल लटक जाती है। पूरे तंत्र के बीच बिल्डर को भारी आर्थिक नुकसान (ब्याज) उठाना पड़ता है। प्रक्रिया को देखकर ऐसा लगता है कि रेरा वाले साहब' को सरकारी एजेंसियों (मनपा-एनआईटी) पर भरोसा नहीं है।

बिल्डरों का मानना है कि अगर अप्लाई करते वक्त जो नंबर अस्थायी तौर पर दिया जाता है। उसी आधार पर बिल्डरों को प्रोजेक्ट की मार्केटिंग की अनुमति मिल जानी चाहिए। इससे बिल्डरों का समय भी बचेगा और पैसे की बचत भी होगी। इसका लाभ ग्राहकों को अधिक मिलेगा।

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सरकारी प्रोजेक्ट पर भी सरकारी ग्रहण

मजेदार बात तो यह है कि रेरा की लेटलतीफी का खामियाजा सरकारी विभाग जैसे म्हाडा, मनपा और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जैसी सरकारी संस्थानों पर भी पड़ रहा है। इनके प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलने के बाद भी रेरा रजिस्ट्रेशन लेने में 3-4 माह का वक्त लग जाता है।

स्पष्ट शब्दों में कहा जाए, वर्तमान में रेरा को कभी भी सरकारी विभाग, अधिकारी या कर्मचारियों पर ही भरोसा नहीं रह गया है। प्रक्रियाओं को जानबूझकर जटिल किया जा रहा है और इसका नुकसान पूरे संपत्ति बाजार को उठाना पड़ रहा है।

अग्रवाला ने कहा कि प्लानिंग हो जाती है फेल

अग्रवाला ने कहा कि अगर कोई बिल्डर यह प्लान कर ले कि अगले वर्ष गणपति या नवरात्रि में उसे स्कीम लॉन्च करनी है तो यह उसके लिए सपना से कम नहीं है क्योंकि बिल्डरों को पहले एनओसी के जाल में फंसाया जाता है, यहां से बाहर निकलने पर विभागों के अलग-अलग टेबल से फाइलें गुजरती हैं और अंत में जब मुहर लगने की बारी आती है तो बिल्डर भी भूल चुका होता है कि उसे प्रोजेक्ट कब लॉन्च करना था या कब मार्केटिंग शुरू करनी थी। यह सिटी के विभागों की वास्तविकता है।

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