रामटेक के गढ़मंदिर में खुदाई के दौरान मिला पाषाण कलश, भोंसले कालीन सैन्य और यात्री सुविधाओं का जीवंत प्रमाण

Ramtek Gadmandir News: रामटेक के गढ़मंदिर में खुदाई के दौरान एक प्राचीन पत्थर का कलश मिला है। यह खोज भोंसले काल के दौरान सैन्य और यात्री सुविधाओं के बारे में महत्वपूर्ण प्रमाण प्रदान करती है।
Stone urn found during excavation at Garhmandir in Ramtek, living evidence of military and tourist facilities during the Bhonsle period
प्रचीन कलश की जांच करते हुए पुरातत्व विभाग की टीम (फोटो नवभारत)
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Ramtek Gadmandir Excavation News: विदर्भ की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगरी रामटेक एक बार फिर अपनी प्राचीन विरासत को लेकर चर्चा के केंद्र में है। प्रसिद्ध गढ़मंदिर स्थित रामटेक किले के वराह दरवाजा क्षेत्र में चल रहे सौंदर्यीकरण और सीढ़ियों की खुदाई के दौरान शुक्रवार को एक दुर्लभ प्राचीन पत्थर का कलश (पाषाण पात्र) प्राप्त हुआ है। इस खोज ने न केवल स्थानीय नागरिकों बल्कि इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में भी भारी उत्सुकता जगा दी है।रामटेक किले में मिली इस प्राचीन वस्तु ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि इस पहाड़ी के गर्भ में अभी भी कई ऐतिहासिक रहस्य दबे हुए हैं, जो समय-समय पर सामने आकर हमें अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाते रहेंगे।

खुदाई के दौरान अचानक मिला कलश

शुक्रवार को जब श्रमिक वराह दरवाजे के पास सीढ़ियों के लिए जमीन की खुदाई कर रहे थे, तभी फावड़ा एक कठोर पत्थर से टकराया। सावधानीपूर्वक मिट्टी हटाने पर एक विशाल और सुडौल पत्थर का कलश दिखाई दिया। इसकी बनावट और प्राचीनता को देखते हुए काम को तुरंत रोक दिया गया और मंदिर प्रशासन द्वारा इसकी सूचना नागपुर स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य पुरातत्व विभाग को दी गई। देखते ही देखते यह खबर पूरे क्षेत्र में फैल गई और प्राचीन कलश को देखने के लिए लोगों का तांता लग गया।

पुरातत्व विभाग की जांच और महत्वपूर्ण निष्कर्ष

शनिवार, 11 अप्रैल को नागपुर से पुरातत्व विभाग की एक उच्च स्तरीय त्रिसदस्यीय टीम जांच के लिए रामटेक पहुंची। जांच दल का नेतृत्व कर रहे अधिकारी मारुति बोरटुकने ने कलश की बनावट, पत्थर की गुणवत्ता और उसके स्थान का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि यह कलश मध्यकाल, विशेषकर भोंसले शासनकाल के दौरान उपयोग में लाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण 'जलपात्र' है। विशेषज्ञों के अनुसार किले के प्रवेश द्वारों और महत्वपूर्ण मार्गों पर ऐसे पाषाण कलश रखे जाते थे ताकि दुर्ग की रक्षा करने वाले सैनिकों और दूर-दराज से आने वाले यात्रियों की प्यास बुझाई जा सके। भोंसले कालीन वास्तुकला में इस तरह के पत्थर के पात्रों का विशेष महत्व था। इसी तरह के पात्र अन्य किलों में भी पाए गए हैं, जो तत्कालीन समय की सुव्यवस्थित जल प्रबंधन प्रणाली को दर्शाते हैं।

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संरक्षण की योजना

हालांकि, प्रारंभिक जांच में इस कलश के भीतर कोई कीमती धातु या अन्य अवशेष नहीं मिले हैं, लेकिन पुरातत्व विभाग ने इसे एक अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर माना है। मारुति बोरटुकने ने स्पष्ट किया कि यह पत्थर का पात्र तत्कालीन समाज और सैन्य व्यवस्था के रहन-सहन को समझने में मदद करता है। विभाग ने मंदिर प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि इस कलश को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए ताकि भविष्य में इसे पर्यटकों के प्रदर्शन के लिए संरक्षित किया जा सके।

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