25,567 करोड़ का CMP या ‘कागजी सपना’? नागपुर में ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर सवाल, 20 साल में एक ईंट नहीं लगी

Nagpur Transport Crisis: नागपुर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम बदहाल: 20 साल से सिर्फ कागजों पर दौड़ रहे हैं बस और फ्रेट टर्मिनल। 25,567 करोड़ का नया प्लान क्या सिर्फ एक और 'हसीन सपना' है?
A critical analysis of Nagpur's failing transport system. Why proposed bus and freight terminals have remained on paper for 20 years despite a new ₹25,567 crore mobility plan.
नागपुर ट्रांसपोर्ट सिस्टम (AI Generated Image)
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Transport Comprehensive Mobility Plan Nagpur: देश की अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा रहे 15 शहरों में नागपुर का नाम शामिल हो चुका है। हालांकि, जिस गति से शहर ने अपनी आर्थिक स्थिति ऊंची की है, उतनी ही स्पीड से शहर का ट्रांसपोर्ट (पब्लिक व फ्रेट) सिस्टम भी गर्त में समाता रहा। ऐतिहासिक शहर से स्मार्ट सिटी की ओर बढ़ रहे इस शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम बद से बदतर होता जा रहा है।

वजह है, पिछले 20 वर्षों से सिर्फ कागजों पर दौड़ रहे शहर के बाहर प्रस्तावित बस और फ्रेट टर्मिनल। यदि पिछले 10 वर्षों में भी इस योजना को धरातल पर ला दिया जाता तो आज शहर की सड़कों को हर दिन भारी वाहनों के वजन से राहत दी जा सकती थी। इस राहत का सीधा असर हर दिन घर से निकलने वाले नागपुरवासियों पर होता।

फिर क्यों परोस दिया यही हसीन सपना

महानगर पालिका (मनपा) और नागपुर सुधार प्रन्यास (एनआईटी) के योजनाकारों ने एक बार फिर शहरवासियों के सामने 25,567 करोड़ का 'हसीन सपना' परोस दिया। महामेट्रो के माध्यम से 2025-2024 के लिए पेश किया गया नया 'कॉम्प्रिहेंसिव मोबिलिटी प्लान' (सीएमपी) दरअसल पुरानी विफलताओं पर नई चमक चढ़ाने जैसा है। पिछले 2 दशकों से हर योजना में बस टर्मिनल और फ्रेट टर्मिनल का जिक्र तो होता है, लेकिन जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। प्रशासन की इस नाकामी का खामियाजा आज लाखों शहरवासी हर दिन दमघोंटू ट्रैफिक और जानलेवा जाम के रूप में भुगत रहे हैं।

दशकों से 'सिर्फ घोषणा', मंशा पर उठते सवाल

हैरानी की बात यह कि पिछले २० वर्षों से शहर के विकास का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन बुनियादी परिवहन ढांचा आज भी वहीं खड़ा है जहां वह दो दशक पहले था। चाहे पारसोडी और खैरी के बस टर्मिनल हों या ऑटोमोटिव चौक और कापसी के फ्रेट टर्मिनल-इनका जिक्र हर सरकारी फाइल में 'कॉपी-पेस्ट' किया जाता है। यदि पिछले 10 वर्षों में भी इन टर्मिनलों का निर्माण कर लिया गया होता, तो आज शहर के भीतर भारी वाहनों का प्रवेश बंद होता और आम जनता को ट्रैफिक से बड़ी राहत मिल चुकी होती। सवाल उठता है कि क्या प्रशासनिक एजेंसियां सिर्फ घोषणाएं करने के लिए बनी हैं या उनकी मंशा कभी काम करने की थी ही नहीं?

विकास का 'डिल्यूजन': 70 प्रश बसें डिपो में, योजनाएं हवा में

प्रशासन बड़े-बड़े दावे करता है कि शहर में 662 बसें हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनमें से 200 से ज्यादा बसें सड़कों पर उतर ही नहीं पातीं। 400 नई इलेक्ट्रिक बसों के आने का वादा पूरा होता दिख रहा है लेकिन इनके लिए उचित और उपयोगी टर्मिनल अब भी नहीं है। जब मौजूदा बेड़े को संभालने के लिए पर्याप्त टर्मिनल और डिपो नहीं हैं, तो नई बसों का अंबार लगाकर प्रशासन क्या साबित करना चाहता है? गणेशपेठ और मोरभवन जैसे टर्मिनलों के पुनर्विकास की फाइलें धूल फांक रही हैं, जबकि यात्री आज भी बारिश में कीचड़ और गर्मी में कड़ी धूप में अव्यवस्था के बीच बसों में सवार होने को मजबूर हैं।

फ्रेट टर्मिनल: शहर को जाम के हवाले करने की साजिश

  • मालवाहकों (फ्रेट) के लिए शहर के बाहर टर्मिनल बनाने की योजना 2 दशकों से ठंडे बस्ते में है।
  • गुमगांव, गोंडखैरी और कापसी में प्रस्तावित टर्मिनल केवल नक्शों पर रंग भरने के काम आ रहे हैं।
  • नतीजा यह है कि भारी ट्रक और ट्रेलर शहर के रिहायशी इलाकों में बेखौफ दौड़ रहे हैं, जिससे दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं।
  • सड़कें समय से पहले दम तोड़ रही हैं। सुबह 7 से रात 9 बजे तक का नो एंट्री प्रतिबंध कागजों तक सीमित है क्योंकि धरातल पर इंफ्रास्ट्रक्चर का नामोनिशान नहीं है।

प्रशासनिक विफलता या जानबूझकर अनदेखी?

क्या नागपुर की प्रशासनिक एजेंसियां भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगाने में फेल हो गई हैं? या फिर ये योजनाएं केवल कंसल्टेंट्स की जेबें भरने और टेंडर का खेल खेलने के लिए बनाई जाती हैं? वर्ष 2025-2054 का नया प्लान भी उसी राह पर चलता दिख रहा है। जब 20 वर्षों में पुराने प्लान लागू नहीं हो सके, तो अगले 30 साल का यह रोडमैप जनता के भरोसे को फिर से तोड़ने जैसा है।

बार-बार एक ही योजना को कागज पर दिखाकर लगता है कि जैसे शहर को बसों और भारी वाहनों की सुव्यवस्था से अवगत ही नहीं कराना है। राजनीतिक मंशा कई बड़े काम पूरा कर चुकी है लेकिन शहर की सड़कों को राहत देने वाली इस ट्रांसपोर्ट टर्मिनल योजना के लिए किसी सरकार, किसी नेता और किसी के भी नेतृत्व वाला स्थानीय प्रशासन मंशा रखता दिखाई नहीं दिया और न दिखाई दे रहा है।

शहरवासियों का सब्र जवाब दे रहा है…

  • नागपुर अब वह 'छोटा शहर' नहीं रहा। यहां की आबादी और जरूरतें तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन मनपा और एनआईटी के अधिकारी आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं।
  • कुल 25,567 करोड़ की इस भारी-भरकम राशि का निवेश क्या वाकई जमीन पर दिखेगा या एक बार फिर इसे अगली मोबिलिटी योजना के लिए बचाकर रख दिया जाएगा?
  • इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा और इन परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा नहीं किया गया, तो नागपुर का भविष्य 'स्मार्ट' नहीं, बल्कि 'जाम और बदहाली' का पर्याय बनकर रह जाएगा।
  • कागजी घोड़ों को लगाम दीजिए और जमीन पर काम शुरू कीजिए वरना जनता अब इन झूठे आंकड़ों के मायाजाल को समझ चुकी है।
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