

Nagpur Constitution Square History Protest: आंदोलनों का शहर के रूप में अपनी खास पहचान रखने वाले नागपुर में एक बार फिर पुराने दिनों की तरह संघर्ष की आग सुलग उठी है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर विदर्भ आंदोलन, नाम विस्तार आंदोलन और अब नीट परीक्षा व सरकार विरोधी नीतियों के खिलाफ 'जेन जी' के आक्रामक प्रदर्शनों ने शहर के राजनीतिक और सामाजिक तापमान को बढ़ा दिया है। इन तमाम ऐतिहासिक और वर्तमान आंदोलनों का मुख्य केंद्र बिंदु हमेशा की तरह ऐतिहासिक 'संविधान चौक' ही रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी नागपुर का स्वतंत्रता आंदोलनों में गहरा इतिहास रहा है। वर्ष 1920 में महात्मा गांधी ने नागपुर से ही 'असहकार आंदोलन' की शुरुआत की थी। इसके बाद 1923 का 'झंडा सत्याग्रह' और 1933 में अस्पृश्यता निर्मूलन व हरिजन कल्याण के लिए गांधीजी का आगमन इसका गवाह है। स्वतंत्रता की इस लड़ाई में नागपुर के गोलीबार चौक पर अंग्रेजों की गोलीबारी में कई युवाओं ने शहादत भी दी थी।
स्वतंत्र विदर्भ की मांग: स्वतंत्रता के बाद विदर्भ राज्य के गठन के लिए लंबा संघर्ष चला। जांबुवंतराव धोटे के नेतृत्व में विदर्भवादियों ने कई वर्षों तक आक्रामक लड़ाई लड़ी जिसकी गूंज आज भी समय-समय पर सुनाई देती है।
नाम विस्तार आंदोलन:डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के नाम विस्तार के लिए आंबेडकरी आंदोलन के तहत नागपुर से भी बड़ा जनसैलाब उमड़ा था। इस आंदोलन के दौरान उत्तर नागपुर के इंदोरा चौक पर हुई गोलीबारी में कई कार्यकर्ता शहीद हुए थे। इस पूरे संघर्ष की याद में कामठी रोड स्थित टेन नंबर पुल पर आज एक भव्य शहीद स्मारक मौजूद है।
ओबीसी और वर्गीकरण आंदोलन : बीते कुछ समय में ओबीसी आरक्षण और अनुसूचित जाति उप-वर्गीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी नागपुर में बड़े मोर्चे और प्रदर्शन देखने को मिले हैं।
जिस तरह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए 'जंतर-मंतर' को मुख्य स्थल माना जाता है, ठीक उसी तरह नागपुर में 'संविधान चौक' हर वर्ग, जाति, धर्म और पंथ के नागरिकों के लिए अपने न्यायोचित अधिकारों की मांग करने का सबसे प्रमुख और प्रतिष्ठित स्थल बन चुका है।
शहर के हर बड़े आंदोलन का गवाह यही चौक रहा है, आंदोलन जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है। संविधान ने हमें अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए लड़ने का अधिकार दिया है। हर आंदोलन की अपनी एक भूमिका होती है। आज का युवाओं का यह आंदोलन उनकी जागरूकता, अधिकारों और भावनाओं का जीवंत प्रतीक है।
-पूर्व सांसद एवं नाम विस्तार आंदोलनकारी, प्रा.डॉ. जोगेंद्र कवाडे