Civil Lines Nagpur का बदलता चेहरा: क्या खत्म हो जाएगी ब्रिटिश काल की पहचान? जानें पूरी हकीकत

Nagpur Civil Lines History: नागपुर का सिविल लाइंस तेजी से बदल रहा है। ब्रिटिशकालीन विरासत और आधुनिक विकास के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है। जानें सिविल लाइंस का पूरा इतिहास।
Nagpur Civil Lines History Vs Development
नागपुर सिविल लाइंस स्थित बंगला (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur Civil Lines History Vs Development: सिविल लाइंस नागपुर, शहर का एक ऐसा इलाका जो कभी ब्रिटिश अधिकारियों की शान और सत्ता का केंद्र हुआ करता था, आज बदलाव के दौर से गुजर रहा है। 19वीं सदी में अंग्रेजों द्वारा बसाया गया यह क्षेत्र चौड़ी सड़कों, बड़े बंगलों और हरियाली के लिए जाना जाता था। लेकिन अब इसका स्वरूप तेजी से बदल रहा है।

कैसे बना सिविल लाइंस?

नागपुर की सिविल लाइंस का विकास ब्रिटिश शासनकाल में 19वीं सदी के मध्य और उत्तरार्ध में हुआ। जब 1853 में नागपुर का ब्रिटिश भारत में विलय हुआ, उसके बाद अंग्रेज प्रशासन ने शहर में अपने अधिकारियों, न्यायाधीशों और वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए अलग सुव्यवस्थित आवासीय क्षेत्र बसाने शुरू किए। देशभर में दिल्ली सहित अनेक शहरों में सिविल लाइंस बनाए गए क्योंकि अंग्रेज अधिकारी पुराने भीड़भाड़ वाले शहर से अलग रहना चाहते थे।

प्रशासनिक भवनों, न्यायालयों और सरकारी कार्यालयों के पास रहना सुविधाजनक था। चौड़ी सड़कें, बड़े बंगले, पेड़ों से घिरे मार्ग और खुला वातावरण उन्हें चाहिए था। नागपुर का सिविल लाइंस भी ब्रिटिश अधिकारियों और उच्च पदस्थ कर्मचारियों का प्रमुख निवास क्षेत्र बना।

अब क्यों बदल रहा है स्वरूप?

ब्रिटिशकालीन कई सरकारी बंगले, विश्रामगृह, चर्च, क्लब और प्रशासनिक भवन आज भी उस काल की याद दिलाते हैं लेकिन अब हालात बदल गए हैं। हालांकि स्वतंत्रता के बाद यह इलाका सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों, न्यायिक अधिकारियों और प्रशासनिक संस्थानों का प्रमुख इलाका बना रहा। अब धीरे-धीरे यहां आधुनिक सरकारी इमारतें, हाईराइज फ्लैट स्कीम, होटल, लान्स, कार्यालय और व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी विकसित हुए हैं। समय की जरूरतों के अनुरूप सरकार भी अब नई-नई इमारतों का निर्माण कर रही है। तेजी से स्वरूप बदल रहा है जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि सिविल लाइंस की पहचान अतीत में गुम हो जाएगी और इसके अवशेष इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगे।

Nagpur Civil Lines History Vs Development
नागपुर सिविल लाइंस स्थित पुरानी इमारतें (सोर्स: सोशल मीडिया)

‘औपनिवेशिक विरासत’ खत्म करने की कोशिश?

दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार चाहती है कि औपनिवेशिक काल के नामों, प्रथाओं, अवशेषों को हटाकर भारतीयता की जड़ों को भावी पीढ़ी जानें। इसलिए औपनिवेशिक काल के कानूनों, नामों और प्रथाओं के अवशेषों को हटाकर भारतीय मूल के विकल्प अपनाने के प्रयास तेज किये गये हैं। दिल्ली से इसकी शुरुआत हुई है। ‘सिविल लाइंस’ की व्यवस्था को भी ऐसी ही विरासतों में से एक माना गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी में मंत्रियों और शीर्ष नौकरशाहों से औपनिवेशिक दौर की प्रथाओं की पहचान करने और भारतीय जड़ों वाले विकल्प सुझाने को कहा था। दिल्ली में अंग्रेजों के नाम से जो सड़कें थीं उनका नाम भी बदल दिया गया है। नागपुर में हालांकि स्थिति अलग है। हां, ब्रिटिशकालीन अनेक इमारतें, हाई कोर्ट, विभागीय आयुक्त कार्यालय, कलेक्ट्रेट, अजब बंगला, विधान भवन आदि मौजूद हैं लेकिन इन्हें हैरिटेज में शामिल किये जाने से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

क्या होगा पुराने बंगलों का?

बताया जाता है कि सिविल लाइंस में अंग्रेज किसी भी आम भारतीय नागरिकों को प्रवेश तक नहीं करने देते थे लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यह स्थिति बदल गई है। अब तो सिविल लाइंस में सरकारी अधिकारियों के बंगले ही शेष रह गए हैं। इन बंगलों में आईएएस व आईपीएस अधिकारी रहते हैं। एकड़ों में फैले इन बंगलों की जगह किसी एक बंगले की जमीन पर मल्टीस्टोरी अधिकारी निवास निर्माण का प्रस्ताव भी है ताकि शेष बंगलों की जमीनों का उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सके।

नई व्यवस्था के लिए कलेक्ट्रेट की नई इमारत बन रही है जिसमें विभागीय आयुक्त आदि के कार्यालय शिफ्ट होंगे। रवि भवन व नाग भवन में मंत्रियों के स्वतंत्र बंगलों की जगह एक टावर बनाने का प्रस्ताव है। मंजूरी भी मिल गई है। कार्य जल्द शुरू होने की अपेक्षा है।

शाम से ही छा जाती है वीरानी

आज हालत यह है कि सिविल लाइंस एरिया में कुछ सड़कों पर शाम होते ही वीरानी छा जाती है। यहां रहने वाले नागरिकों के लिए न ही शॉपिंग कॉम्प्लेक्स हैं और न ही कोई हॉकर जोन जहां इच्छा होने पर कुछ खरीदी करने जा सकें। अन्य आम कॉलोनियों की तरह ही इस इलाके का विकास होना चाहिए। बड़े-बड़े एरिया में पसरे बंगलों, रवि भवि, नाग भवन जैसे परिसरों को तोड़कर नये नियोजन व जरूरतों के अनुरूप विकास किया जाना चाहिए। जो भी बदलाव हुए हैं वह निजी सम्पत्तिधारकों द्वारा ही किये गए हैं। सरकारी स्तर पर अंग्रेजियत साहबगिरी वाला कल्चर समाप्त करने की दिशा में तेज कदम उठाने की मांग तो अनेक संगठनों द्वारा पहले भी की गई है।

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