

कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीट बरकरार रखी।
वंजारी को 67,231 और भाजपा के सुधाकर कोहले को 63,960 वोट मिले।
पहली पसंद के मतों में कोहले 4,294 वोटों से आगे थे।
निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले को पहली पसंद के 24,249 वोट मिले।
दूसरी पसंद के मतों की गिनती के बाद चुनाव का परिणाम बदल गया।
कांग्रेस नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहकर चुनावी अभियान चलाया।
Devendra Fadnavis Nitin Gadkari Bastion: नागपुर जिले में राजनीति में कांग्रेस को लेकर एक कहावत बहुत ही प्रसिद्ध थी कि 'कांग्रेस को कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस ही हराती है'। दरअसल, यह कहावत कांग्रेस की भीतरी व आपसी गुटबाजी को लेकर चला करती थी।
विधान परिषद के चुनाव में आए परिणाम, खासकर नागपुर स्नातक सीट के परिणाम के बाद महकमे में कहा जाने लगा है कि अब भाजपा ही भाजपा को हराने लगी है। यह भी गुटबाजी के संदर्भ में ही है, जो इस चुनाव में नागपुर में खुली बगावत व गुटबाजी के रूप में देखने को मिला।
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि नागपुर न केवल आरएसएस का मुख्यालय है बल्कि राज्य के मुखिया देवेंद्र फडणवीस का गृहनगर और केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गढ़ है।
जब से भाजपा ने अपना उम्मीदवार घोषित किया, तभी से स्थानीय भाजपा कई खेमों में बंट गई। कोई दबी जुबान नाराजगी जता रहा था तो कोई खुलेआम विरोध मोड पर आ गया था। जिस तरह की माइक्रो प्लानिंग भाजपा की चल रही थी, उससे दावा किया जा रहा था कि वह अपने इस गढ़ को दोबारा हासिल करने में सफल होगी लेकिन सफलता नहीं मिल पायी।
ऐसा भी नहीं रहा कि भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने इस चुनाव में दम नहीं दिखाया। वे करीब सवा साल से इस सीट पर मतदात्ता पंजीयन प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे थे। दावा किया गया कि लगभग 1.50 लाख से अधिक स्नातक मतदाताओं का पंजीयन भाजपा की ओर से किया गया था।
प्रचार में भी कोई कमी नहीं रखी गई। स्वयं देवेंद्र फडणवीस, गडकरी ने भी कमान संभाली। वर्ष 2020 में चुनाव की तुलना में कोहले का पहली पसंद की वोटिंग शानदार रही। इस चुनाव में पहले राउंड में कोहले को 61660 और अभिजीत वंजारी को 57615 वोट मिले थे।
मतलब भाजपा पहले राउंड में आगे थी जबकि 2020 में वंजारी भाजपा के उम्मीदवार संदीप जोशी से पहले राउंड में 14,407 वोटों से आगे थे। वंजारी 55,947 और जोशी को 41,540 वोट हासिल हुए थे। चूंकि जीत का कोटा उस चुनाव में भी किसी ने हासिल नहीं किया था, इसलिए दूसरी वरीयता की काउंटिंग हुई थी। .
अभिजीत वंजारी को 61,701 और जोशी को 42,791 वोट मिले थे, इस चुनाव में कोहले पहली पसंद क्रम में तो शानदार रहे लेकिन दूसरी पसंद के वोट ने खेला कर दिया। वंजारी को दूसरी पसंद का जो बम्पर वोट मिला उसकी कांग्रेस को भी अपेक्षा नहीं थी। यहीं से भाजपा खेमे में सारे संदेहों ने जन्म लिया।
संघ मुख्यालय वाले नागपुर में अपना कब्जा बरकरार रखना कांग्रेस के सामने चुनौती थी, पार्टी में आपसी खींचतान, मतभेद और नाराजगी नई बात नहीं है। इस बार भी कुछ ऐसा ही माहौल था। एक नेता मंच पर मौजूद रहता तो दूसरा उससे दूरी बनाए रखता था।
शुरुआत में कुछ नेताओं ने नाराजगी भी जताई। हालांकि अंतिम चरण में सभी प्रमुख नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में मैदानी मोर्चा संभाला, जिसका अनुकूल परिणाम सामने आया। अभिजीत बंजारी सहित कांग्रेस नेताओं ने आपसी मतभेद भुलाकर और खुद को लो-प्रोफाइल रखते हुए पिछली बार जीती गई सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा।
भले ही कांग्रेस के नेता हर समय एकजुट होकर साथ नहीं दिखे, लेकिन किसी ने भी दूसरे के काम में दखल देने, हस्तक्षेप करने या विरोध करने से परहेज किया। नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों और समाजों में बैठकें लेकर मतदाताओं से समर्थन की अपील की।
विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय बडेट्टीवार, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले, पूर्व मंत्री नितिन राऊत, सुनील केदार, राजेंद्र मुलक, विधायक विकास ठाकरे, शहर कांग्रेस अध्यक्ष प्रफुलल गुडघे, जिला अध्यक्ष अश्विन बैस सहित अन्य नेताओं ने भी अपने स्तर पर चुनावी रणनीति बनाई और अपना कब्जा चरकरार रखने में सफल हुए।
उम्मीदवारी घोषित होने के बाद बीजेपी में जो नाटकीय घटनाक्रम चला वह परिणाम के बाद भी चर्चा का विषय बन गया है। दरअसल, संघ व संगठन से जुड़े निष्ठावान पूर्व विधायक अनिल सोले और गिरीश व्यास ने खुली बगावत कर दी थी। पार्टी की अपील के बाद भी सोले ने नामांकन वापस नहीं लिया था।
सीएम को उनके घर जाकर चर्चा करनी पड़ी और तब उन्होंने मैदान से हटने व अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन में कार्य करने की घोषणा की थी। उस दौरान कयास लगने लगे थे कि भले ही नेता ने कदम पीछे खीचे लिये हों लेकिन उनके समर्थक कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर हुई हो, यह जरूरी नहीं, कांग्रेस नेताओं ने भी दावा करना शुरू कर दिया था कि बीजेपी के नाराज कार्यकर्ता आलानेताओं की कार्यप्रणाली के विरोध में जाएंगे और फायदा उसके उम्मीदवार को होगा।
बैलेट में मतदान पत्रिका पर कोहले के नाम के सामने 'गोले में 2' लिखने का जो पैटर्न सामने आया, वैसा पूर्व के चुनाव में कभी देखा नहीं गया। ये हजारों वोट अवैध घोषित हो गए, पहले राउंड में कराले ने 24,890 वोट लिये और कहा जा रहा है यही सेकंड पसंद की गिनती में बीजेपी के लिए किलर साबित हुआ। चर्चा है कि भाजपा से नाराज मतदाताओं ने कांग्रेस को सेकंड वरीयता में वोट डाल दिया। यह कितना सच है, यह कहना मुश्किल है लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं में ही इस तरह की चर्चा चल रही है।