क्या न्यायपालिका पर आलोचना नहीं हो सकती? नागपुर में पूर्व न्यायमूर्ति अभय ओक का बयान, जानें क्या दिए सुझाव

Justice Abhay Oka: सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओक ने कहा कि किसी भी संस्था को दोषमुक्त नहीं माना जा सकता। न्याय व्यवस्था के अध्ययन और निष्कर्षों से ही सकारात्मक बदलाव संभव हैं।
Abhay Oka on criticism of the judiciary
व्याख्यान में जस्टिस अभय ओक ने रखी बातफोटो सोर्स- नवभारत
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Abhay Oka Judiciary Criticism Debate: सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओक ने कहा कि न्यायपालिका को लेकर कई तरह के भ्रम पैदा हुए हैं। किसी भी संस्था को दोषमुक्त नहीं माना जा सकता। न्याय व्यवस्था का शास्त्रोक्त पद्धति से अध्ययन कर उसके निष्कर्ष राज्यकर्ताओं तक पहुंचाए जाने चाहिए, तभी न्याय व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव संभव होंगे।

डॉ. दंदे फाउंडेशन की ओर से शनिवार को वनामती सभागृह में 'क्या न्यायपालिका पर कोई आलोचना नहीं हो सकती है?' विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया था। इस अवसर पर न्यायाधीश ओक ने उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम में डॉ. दंदे फाउंडेशन के प्रमुख डॉ. पिनाक दंदे तथा शैलेश पांडे उपस्थित थे।

नीति बनाने की जरूरत

उपस्थित लोगों का मार्गदर्शन करते हुए न्यायाधीश ओक ने कहा कि अच्छे वकीलों का न्यायाधीश बनने से इनकार करना केंद्र सरकार की विफलता है। न्यायाधीशों को बहुत कम छुट्टियां मिलती हैं और इसका उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

इस विषय पर गंभीरता से विचार होना आवश्यक है। व्यावसायिक मामलों को कितनी प्राथमिकता दी जाए, इस पर भी नीति बनाने की जरूरत है।

न्यायाधीश ओक ने कहा कि किसी संस्था को पवित्र मानने से अंधभक्ति शुरू होती है और व्यक्तिपूजा हमेशा पतन की ओर ले जाती है। न्याय व्यवस्था को भय और पक्षपात से मुक्त होकर कठोरता से काम करना चाहिए, हालांकि न्यायाधीशों द्वारा उस आलोचना का जवाब नहीं देना एक स्थापित परंपरा है। संचालन चैतन्य देशपांडे ने किया। इस अवसर पर पूर्व मंत्री अनिल देशमुख, विलास मुत्तेमवार, अभिजीत वंजारी समेत अन्य उपस्थित थे।

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'तारीख पर तारीख' की समस्या वास्तविक

उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 के बाद न्यायपालिका में विश्वास का संकट पैदा हो गया। इसका मुख्य कारण तालुका और जिला न्यायालयों की पूर्ण उपेक्षा है, जो न्यायिक प्रणाली की रीढ़ हैं। आम आदमी बड़ी उम्मीद के साथ अदालत जाता है। अगर हम कल के आंकड़ों पर नजर डालें तो 5 करोड़ मामले लंबित है।

इस गड़बड़ी का कारण न्यायाधीशों और जनसंख्या का अनुपात है। जहां 10 लाख जनसंख्या पर 50 न्यायाधीशों का अनुपात अपेक्षित है वहीं वर्तमान अनुपात 22 है। 'हर सुनवाई के लिए तारीख' का मजाक सच साबित होता है लेकिन इसका समाधान न्यायपालिका के हाथ में नहीं, बल्कि सरकार की जिम्मेदारी है।

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