

Nagpur Traffic Horn Noise: नागपुर शहर की सड़कों पर कानफोड़ हॉर्न के शोर का साम्राज्य देखकर लगता है कि यह 'हॉर्न-किंग सिटी' बनने के लिए आतुर है। सिग्नल रेड से ग्रीन होते ही पीछे से लगातार हॉर्न, आगे जगह नहीं तो और अधिक तेज हॉर्न और ट्रैवल्स बसों का कर्कश शोर, मानो सड़क नहीं बल्कि शोर प्रतियोगिता का मैदान हो।
सवाल है कि शहर की सड़कों को इस बेवजह के शोर से कब राहत मिलेगी? वैरायटी, संविधान, महाराजबाग, मेडिकल, अजनी, इंदोरा, मानकापुर, मानेवाड़ा, कामठी रोड, वर्धा रोड के छत्रपति चौक, जयप्रकाश, जयस्तंभ, मानस, कॉटन मार्केट चौक सहित अन्य व्यस्त इलाकों में आम वाहनों के साथ ट्रैवल्स बसों की कर्कश हॉर्निंग परेशानी का सबब है। कुछ बस चालक जरूरत से ज्यादा हॉर्न बजाते नजर आते हैं।
शहर के किसी नागरिक को शायद ही पता हो कि शहर में कौन-सा क्षेत्र साइलेंस जोन घोषित है। कोर्ट क्षेत्र, हॉस्पिटल या स्कूल-कॉलेज, हर जगह हॉर्न का शोर। समय की जरूरत है कि पुलिस और प्रशासन सर्वे कर हॉस्पिटलों, स्कूल-कॉलेजों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों जैसे मेडिकल, मेयो, डागा हॉस्पिटल, प्रमुख प्राइवेट हॉस्पिटल, स्कूल-कॉलेजों के प्रवेश क्षेत्र, न्यायालय परिसर, वृद्धाश्रम और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों के आसपास के मार्ग को साइलेंस जोन घोषित करें, हालांकि यहां केवल बोर्ड लगाने से काम नहीं चलेगा।
इन क्षेत्रों में विशेष निगरानी और तत्काल ई-चालान की कार्यवाई भी जरूरी है। लगातार तेज हॉर्न कानों में गूंजने से सुनने की क्षमता में कमी, कानों में घंटी जैसी गुनगुनाहट, सिरदर्द, नींद की कमी, तनाव, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी हो सकती है। हाई ब्लडप्रेशर और हृदय रोग संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। बच्चों की पढ़ाई, ध्यान और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।
मोटर वाहन अधिनियम, 1988: धारा 194F के तहत सार्वजनिक स्थान पर अनावश्यक या अत्यधिक हॉर्न बजाना तथा निर्धारित साइलेंस जोन में हॉर्न का इस्तेमाल दंडनीय है। पहली बार उल्लंघन पर 1,000 रुपये और दूसरी या बाद की बार 2,000 रुपये जुर्माना लगाया जा सकता है।
मोटर व्हीकल (ड्राइविंग) रेगुलेशन, 2017: विनियम 23 में भी अनावश्यक हॉर्न पर रोक है। हॉर्न सुरक्षा संबंधी खतरे की चेतावनी के लिए ही बजाया जाना चाहिए। लगातार, बार-बार या आवश्यकता से अधिक हॉर्न बजाना तथा साइलेंस जोन में हॉर्न बजाना निषिद्ध है।
मिजोरम की राजधानी आइजोल को देश की 'साइलेंट सिटी' कहा जाता है। यहां संकरी सड़कों पर भी वाहन चालक अनावश्यक हॉर्न से बचते हैं।
यह केवल पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि नागरिक अनुशासन और संयम का परिणाम माना जाता है। सवाल है-क्या नागपुर में ट्रैफिक जाम का मतलब हर वाहन चालक के लिए हॉर्न दबाना होना चाहिए?
दूसरी ओर चंडीगढ़ ट्रैफिक पुलिस ने 'नो हॉर्न' को रोड सेफ्टी और शोर प्रदूषण से जोड़कर जागरूकता अभियान चलाए हैं तथा साइलेंस जोन में अनावश्यक हॉर्निंग के खिलाफ कार्रवाई का मॉडल सामने रखा है।
वाहन चालकों को समझना होगा कि हॉर्न बजाना अधिकार नहीं, जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाने वाला सुरक्षा उपकरण है। आगे वाहन धीमा हो तो सुरक्षित दूरी रखें। सिग्नल या जाम में बेवजह हॉर्न बजाने से रास्ता नहीं खुलता, शोर जरूर बढ़ता है।
ट्रैवल्स बस, ऑटो, टैक्सी या निजी वाहन, यह नियम सभी के लिए समान हैं। 'पहले मैं हॉर्न नहीं बजाऊंगा' से शुरू होने वाला छोटा संकल्प ही 'हॉर्न-किंग सिटी' को 'साइलेंट एंड पीसफुल सिटी' में बदल सकता है।
ऐसा लगता है कि शहरवासियों की नजर में केवल सिग्नल जम्प, हेलमेट, सीट बेल्ट और कागजात ही ट्रैफिक नियमों में शामिल हैं क्योंकि 90 प्रतिशत से अधिक चालान भी केवल इन्हीं नियमों पर काटे जाते हैं।
बेवजह, जानबूझकर और लगातार तेज हॉर्न बजाना नियमों का उल्लंघन नहीं है क्या? पिछले कुछ वर्षों में नागपुर में अनावश्यक या अत्यधिक हॉर्निंग के खिलाफ कितने चालान काटे गए ?
कितने ट्रैवल्स बस चालकों पर कार्रवाई हुई? कितने साइलेंस जोन की नियमित निगरानी की गई? मोटर वाहन अधिनियम में हॉर्न के लिए बाकायदा प्रावधान है।
फिर इसका पालन कराने में इतनी खामोशी क्यों? हेलमेट का चालान तुरंत लेकिन कान फाड़ने वाले हॉर्न पर चुप्पी, यह कैसा ट्रैफिक अनुशासन है?