Nagpur Plot Fraud Case: जांच में सहयोग करने वाले को पुलिस ने दिखाया 'फरार'! HC ने फटकार लगाते हुए दी जमानत

Nagpur Plot Fraud: नागपुर हाई कोर्ट ने चर्चित प्लॉट धोखाधड़ी मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत दी। अदालत ने जांच में सहयोग करने वाले आरोपी को चार्जशीट में फरार दिखाने पर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए।
Nagpur Plot Fraud Case: Police labeled a cooperating individual as 'absconding'! High Court reprimands police and grants bail.
प्लॉट धोखाधड़ी, हाई कोर्ट,(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Nagpur High Court Plot Fraud: नागपुर हाई कोर्ट ने सोनेगांव पुलिस थाना में दर्ज एक बहुचर्चित प्लॉट धोखाधड़ी मामले में आरोपी कुणाल नंदकिशोर येल्ने को अग्रिम जमानत दे दी। न्यायाधीश प्रवीण पाटिल की अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े किए, जहां जांच में पूरा सहयोग करने वाले आरोपी को ही पुलिस ने अपनी चार्जशीट में 'फरार' दिखा दिया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार सोमलवाड़ा स्थित इंजीनियर्स कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के प्लॉट नंबर 5 के असली मालिक अमोल प्रभाकर जोशी हैं। मामले का खुलासा तब हुआ जब अमोल के पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर (विजय) ने 23 अप्रैल 2025 को ऑनलाइन प्रॉपर्टी का स्टेटस चेक किया। उन्होंने पाया कि संपत्ति के रिकॉर्ड में 10 अप्रैल 2025 को कुणाल नंदकिशोर येल्ने का नाम दर्ज हो चुका है, जिसे 4 मार्च 2025 को एक फर्जी सेल डीड के जरिए बेचा गया था।

सरकारी गजट में भी बदला नाम

जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि सुनील अजबराव जिवतोड़े नामक एक जालसाज ने सरकारी गजट में अपना नाम बदलकर असली मालिक 'अमोल प्रभाकर जोशी' कर लिया था। उसने फर्जी आधार कार्ड और पैन कार्ड बनवाकर यह प्लॉट कुणाल येल्ने को बेच दिया। इसके कुछ ही दिन बाद 28 मार्च 2025 को कुणाल ने वही प्लॉट मोहम्मद सलीम खान को बेच दिया।

इसी जानकारी के आधार पर सोनेगांव पुलिस स्टेशन में 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। 'मैं खुद जालसाजी का शिकार हुआ' कुणाल येल्ने ने अदालत में अग्रिम जमानत की गुहार लगाते हुए दावा किया कि वह इस संपत्ति का एक बोनाफाइड खरीदार है और सुनील जिवतोड़े ने उसके साथ भी धोखा किया।

कुणाल ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए बताया कि इस प्लॉट को खरीदने के लिए उसने 60 लाख रुपये का बैंक लोन लिया था, जिसकी किस्तें वह नियमित रूप से चुका रहा है। दूसरी तरफ सरकारी वकील ने बैंक लेन-देन का हवाला देते हुए जमानत का कड़ा विरोध किया और कहा कि आरोपी भविष्य में भी इस तरह के अपराध कर सकता है।

पुलिस की बड़ी लापरवाही आई सामने

सुनवाई के दौरान पुलिस की एक बहुत बड़ी लापरवाही उजागर हुई, हाई कोर्ट ने कुणाल को इस शर्त पर अंतरिम राहत दी थी कि वह हर सोमवार और शुक्रवार को पुलिस स्टेशन में हाजिरी देगा और जांच में सहयोग करेगा।

कुणाल ने अदालत के निर्देशानुसार पुलिस स्टेशन में नियमित हाजिरी दी और पूरा सहयोग किया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से जब पुलिस ने पूरक चार्जशीट दायर की, तो उसमें कुणाल को 'फरार' घोषित कर दिया गया।

कोर्ट ने माना कि पुलिस जांच अधिकारी ने मामले से जुड़े सभी अहम दस्तावेज और आरोपी के बैंक खातों की जानकारी पहले ही जब्त कर ली

है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'प्रदीप एन.शर्मा बनाम गुजरात राज्य' (2025) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि यदि आरोप दस्तावेजों पर आधारित है और बिना हिरासत के आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकती है, तो कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता नहीं होती है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने कुणाल येल्ने को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानतदार की शर्त पर अग्रिम जमानत दे दी।

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