

Nagpur Deemed University UGC Notice: नागपुर डीम्ड यूनिवर्सिटी के वित्त अधिकारी को बिना किसी पूर्व सूचना और उचित प्रक्रिया के अचानक सेवा से हटाने के आदेश पर न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश राज वाकोडे ने रोक लगा दी है।
कोर्ट ने इस पूरी कार्रवाई को 'प्रथम दृष्टया मनमाना' करार दिया और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिकाकर्ता ब्रजेश लोहिया ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर 18 अगस्त 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई थीं।
याचिकाकर्ता को 14 जून 2006 को एक वर्ष के लिए अस्थायी तौर पर अकाउंट्स ऑफिसर के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में 7 जुलाई 2007 को बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की विधिवत मंजूरी के बाद उन्हें 1 जुलाई 2007 से स्थायी रूप से फाइनेंस ऑफिसर बना दिया गया, उन्हें 1 जून 2019 से 7वें केंद्रीय वेतन आयोग के अनुसार वेतन मिल रहा था और केंद्र सरकार ने भी दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च में उनकी नियुक्ति को अपनी मंजूरी दे दी थी।
अदालत को बताया गया कि 2 जून 2023 को यूजीसी ने नए नियम जारी किए। इसके तहत पहली बार फाइनेंस ऑफिसर के पद को 5 साल के कार्यकाल (टेन्योर पोस्ट) में बदल दिया गया और सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष तय की गई। (इससे पहले यह पूर्णकालिक वेतनभोगी पद था)।
इसी नए नियम का हवाला देते हुए 11 अगस्त 2026 को याचिकाकर्ता को अचानक एक ईमेल मिला जिसमें बताया गया कि 18 अगस्त 2026 को नए फाइनेंस ऑफिसर की नियुक्ति के संबंध में चर्चा करने के लिए वित्त समिति की एक आपात बैठक बुलाई गई है। याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने न तो इस्तीफा दिया है और न ही उन्हें पद से हटाया गया है तो फिर नए अधिकारी की नियुक्ति की बात कहां से आ गई।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 17 अगस्त को जवाब दिया कि चूंकि उनकी मूल नियुक्ति चयन समिति के बजाय बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट द्वारा की गई थी। इसलिए मामले को आपातकालीन समिति के समक्ष रखा गया है। इसके अगले ही दिन 18 अगस्त 2026 को मनमाने ढंग से उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश पारित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा शर्तों को परिभाषित करने वाले उपनियमों के क्लॉज 40 और 40.1 की ओर आकर्षित किया। इन नियमों के अनुसार, किसी भी स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्ति तभी हो सकती है जब वह स्वयं 3 महीने का नोटिस देकर इस्तीफा दे या 3 महीने का वेतन देकर नौकरी छोड़े। याचिकाकर्ता ने इस्तीफा देने की कोई पेशकश नहीं की थी। इसलिए उनके खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से सेवा नियमों के खिलाफ और मनमानी थी।