

Nagpur Deekshabhoomi Memorial Committee: नागपुर भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा 14 अक्टूबर 1956 को दी गई धम्मदीक्षा के कारण विश्व भर में पवित्र भूमि के रूप में विख्यात दीक्षाभूमि इन दिनों अशांत है। मंगलवार को यह बेचैनी तब और भड़क गई जब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति का अंदरूनी विवाद चरम पर पहुंच गया और एक नई चिंगारी सुलग उठी। इस अप्रत्याशित विवाद के कारण बौद्ध और आंबेडकरी अनुयायियों में भारी चिंता और निराशा का माहौल है क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं इस ऊर्जास्थली की पवित्रता भंग न हो जाए।
अधिकारों का है टकराव स्मारक समिति में मुख्य रूप से अध्यक्ष और सचिव पद को लेकर अधिकारों का टकराव है। वर्तमान में 11 सदस्यीय इस समिति के अध्यक्ष भंते सुरेई ससाई हैं। वहीं डॉ. राजेंद्र गवई समिति के सचिव होने का दावा करते हैं, लेकिन भंते ससाई धर्मादाय आयुक्त (चैरिटी कमिश्नर) के दस्तावेजों का हवाला देते हुए उन्हें सचिव मानने को तैयार नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप अध्यक्ष और सचिव के समर्थकों तथा अन्य ट्रस्टियों के बीच भारी अविश्वास पैदा हो गया है।
यह विवाद तब और अधिक गहरा गया जब भंते ससाई को हटाकर ट्रस्टी विलास गजघाटे को अध्यक्ष पद सौंपने का प्रयास किया गया। सचिव पद विवाद के कारण भंते ससाई का मानना है कि अध्यक्ष के तौर पर उनके पास सर्वाधिकार है, जबकि गवई गुट का कहना है कि सचिव की नियुक्ति होने के कारण सभी धोरणात्मक (नीतिगत) फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए।
वर्ष 2024 में दीक्षाभूमि के सौंदयीकरण कार्य को लेकर भी भारी विरोध हुआ था, जिसमें जनता ने निर्माण सामग्री उखाड़ कर आग के हवाले कर दी थी और अंततः सरकार को पीछे हटना पड़ा था। अब समाज यह सोच रहा है कि क्या दीक्षाभूमि को बचाने के लिए फिर से किसी बड़े आंदोलन की आवश्यकता पड़ेगी? हालांकि आंबेडकरी समाज की स्पष्ट मशा है कि समिति का यह विवाद आपस में बैठकर सुलझाया जाए, जनता किसी भी तीसरे पक्ष या सरकारी हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
1964 में दादासाहेब गायकवाड़ की अध्यक्षता में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति की स्थापना हुई थी। उनके नेतृत्व में 1978 में यहां स्तूप निर्माण का कार्य शुरू हुआ, जो 2001 में पूर्ण हुआ। स्मारक समिति के दूसरे अध्यक्ष और पूर्व राज्यपाल आर.एस. गवई के कार्यकाल में भी दीक्षाभूमि का काफी विकास हुआ। हर साल विजयादशमी (धम्मचक्र प्रवर्तन दिन) के अवसर पर यहां लाखों की संख्या में अनुयायी आते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन भंते सुरेई ससाई के अध्यक्ष बनने के बाद से समिति के ट्रस्टियों में जो अंदरूनी खींचतान शुरू हुई, वह अब तक शांत नहीं हो सकी है।
आंबेडकरी जनता को यह डर सता रहा है कि जिस तरह बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार को बौद्धों के अधिकार में लाने के लिए 135 वर्षों से संघर्ष चल रहा है, कहीं दीक्षाभूमि भी स्मारक समिति के आपसी विवादों के कारण हाथों से न निकल जाए।
वर्तमान में महाविहार मुक्ति के लिए भंते प्रज्ञाशील के नेतृत्व में पिछले 50 दिनों से धरना दिया जा रहा है। गौरतलब है कि महाबोधि महाविहार के लिए भंते अनागरिक के बाद भंते ससाई ने ही कड़ा संघर्ष किया था, जिसके परिणामस्वरूप सरकार को झुकना पड़ा था और वहां की समिति में बौद्ध भंते को सचिव नियुक्त किया गया था।
-नवभारत लाइव के लिए नागपुर से रवि गजभिए की रिपोर्ट