क्या 50 साल में बनेगा दीक्षाभूमि, सुस्त रवैये पर भड़का हाई कोर्ट, NMRDA को दी सख्त चेतावनी

Deekshabhoomi Nagpur Development: दीक्षाभूमि के विकास में देरी पर हाई कोर्ट ने NMRDA को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि इसी रफ्तार से काम चला तो 50 साल में भी काम पूरा नहीं होगा।
Bombay High Court Deekshabhoomi
बॉम्बे हाईकोर्टसोर्स- सोशल मीडिया
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Bombay High Court Deekshabhoomi: ऐतिहासिक दीक्षाभूमि के सौंदर्गीकरण और सर्वांगीण विकास की योजना को लेकर हाई कोर्ट ने प्रन्यास और नागपुर महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (NMRDA) के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई।

बुधवार को सुनवाई के दौरान न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश रजनीश व्यास ने मौखिक रूप से तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर बार वही पुराने जवाब दिए जाते रहे और प्रक्रिया इसी गति से चलती रही तो दीक्षाभूमि का विकास अगले 50-60 वर्षों में भी पूरा नहीं हो पाएगा।

दीक्षाभूमि के सर्वांगीण विकास के लिए वर्ष 2018 में जनहित याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान एनएमआरडीए की ओर से प्रस्तुत की गई जानकारी से अदालत संतुष्ट नहीं हुई। कोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया में अपेक्षित पारदर्शिता नहीं दिखाई देने को लेकर भी मौखिक रूप से नाराजगी व्यक्त की। 

NMRDA ने बताई निविदा प्रक्रिया

दीक्षाभूमि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ऐतिहासिक धम्मदीक्षा आंदोलन से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। हर वर्ष यहां देशभर से बड़ी संख्या में अनुयायी पहुंचते हैं। ऐसे में परिसर के विकास, सौंदर्याकरण, यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं तथा अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर योजनाएं बनाई जाती रही है।

सुनवाई के दौरान एनएमआरडीए की ओर से बताया गया कि दीक्षाभूमि के पुनर्विकास और सौंदर्गीकरण के लिए मेसर्स संदीप काबले आर्किटेक्ट्स एंड प्लानर्स' को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट (पीएमसी) के रूप में नियुक्त किया गया है।

नागपुर महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण के अनुसार, परियोजना के डिजाइन में बदलाव किए जाने के कारण नई ई-निविदा प्रक्रिया अपनानी पड़ी। इस प्रक्रिया में पात्र पाए गए संदीप कांबले को परियोजना लागत के दो प्रतिशत की दर से पीएमसी नियुक्त किया गया है। उन्हें 15 जुलाई 2026 को ऑफर लेटर दिया गया। जबकि 29 जुलाई 2026 को आधिकारिक करार की प्रक्रिया पूरी की गई।

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अगली सुनवाई तक दिखे सकारात्मक प्रगति

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल बैठकों, निविदाओं और कागजी प्रक्रिया की जानकारी देने के बजाय अगली सुनवाई तक जमीन पर सकारात्मक प्रगति दिखाई देनी चाहिए, यदि अगली सुनवाई में ठोस प्रगति नहीं दिखाई गई तो दोनों नोडल एजेंसियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। इस मामले की पिछली सुनवाई 10 अगस्त को हुई थी।

उस समय याचिकाकर्ता के अधिवक्ता शैलेश नारनवरे ने अदालत के समक्ष कहा था कि दीक्षाभूमि का विकास सिंगापुर और दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के शहरों की तर्ज पर करने की योजना है। ऐसे में इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक स्थल के विकास की प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रहना गंभीर विषय है।

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