विदर्भ ने खोया अपना 'संकल्प सारथी', अजित दादा का वो आखिरी वादा, जो अब कभी पूरा नहीं होगा!

Ajit Pawar Vidarbha Connection: अजित पवार के निधन से विदर्भ ने खोया अपना सबसे बड़ा हिमायती। कभी फंड रोकने के आरोप लगे, तो कभी झोली भर दी। जानें विदर्भ से अजित दादा के 'प्रेम' की पूरी कहानी।
Ajit Pawar's demise leaves Vidarbha's development promises unfulfilled. Explore how he transformed from a critic to a benefactor for the Vidarbha region.
नागपुर में अजित पवार (सौजन्य-IANS)
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Ajit Pawar Vidarbha Development: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के असामयिक निधन से विदर्भ क्षेत्र ने एक ऐसा नेता खो दिया है जिसने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र के विकास और राजनीतिक विस्तार पर विशेष ध्यान केंद्रित किया था। कभी विदर्भ की अनदेखी के आरोपों का सामना करने वाले अजित पवार ने महायुति सरकार में शामिल होने के बाद विदर्भ के प्रति अपनी रणनीति और दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया था।

दृष्टिकोण बदलने का लाभ भी उन्हें मिला। विधानसभा और स्थानीय चुनाव में उनकी पार्टी का जनाधार बढ़ता गया। कभी अजित विदर्भ को पैसा देने से कतराते थे जिसके कारण उनकी आलोचना तक होती थी लेकिन हालिया दिनों में उनके प्रति नजरिया बदला और लोकप्रियता में भी वृद्धि हुई।

विदर्भ में बढ़ाया पार्टी का आधार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन के बाद जब अजित पवार को ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न मिला तब उन्होंने पूरे राज्य के साथ-साथ विदर्भ में भी पार्टी की जड़ें मजबूत करने पर जोर दिया। 2024 के विधानसभा चुनावों में विदर्भ की 7 सीटों पर पार्टी ने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें से 6 सीटों पर जीत दर्ज की। स्थानीय निकाय चुनावों में भी उन्हें अच्छी सफलता मिली। अमरावती नगर निगम में पार्टी के 11 पार्षद चुने गए, जबकि नागपुर और अकोला में भी पार्टी ने खाता खोला।

प्रफुल पटेल को सौंपी थी जिम्मेदारी

अजित पवार ने विदर्भ में संगठन को ताकत देने के लिए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल पटेल को विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी। वे खुद भी समय-समय पर विदर्भ के कार्यक्रमों में शामिल होकर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाते थे।

अर्थ मंत्री के रूप में बदला नजरिया

अजित पवार की पहचान एक अनुशासित और मितव्ययी वित्त मंत्री के रूप में थी। महाविकास आघाड़ी और कांग्रेस गठबंधन के दौरान अक्सर उन पर विदर्भ को कम फंड देने के आरोप लगते थे लेकिन महायुति में आने के बाद उन्होंने अपनी छवि बदली। अपने पहले ही बजट में उन्होंने विदर्भ के लिए भारी भरकम निधि का प्रावधान किया।

नागपुर अधिवेशन का वादा : नागपुर के पिछले शीतकालीन सत्र में उन्होंने सार्वजनिक रूप से वादा किया था कि विदर्भ का फंड अब कभी नहीं छीना जाएगा बल्कि इस क्षेत्र को ज्यादा फंड दिया जाएगा।

अधूरा रहा संकल्प : फरवरी में आने वाले आगामी बजट सत्र में वे विदर्भ की झोली और ज्यादा भरने वाले थे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके निधन के साथ ही विदर्भ को दिया गया वह ‘शब्द’ अब अधूरा रह गया।

एक नजर में विदर्भ में अजित पवार की छाप

अनुशासन और विकास की राजनीति करने वाले अजित दादा ने अंतिम समय में विदर्भ के आम नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का भरोसा जीत लिया था। उनका निधन इस क्षेत्र के आर्थिक और राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा झटका है।

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