विश्व गौरैया दिवस: कंक्रीट के जंगलों में फिर चहकेगी गौरैया, नवी मुंबई के युवाओं ने पेश की मिसाल

World Sparrow Day: बढ़ते कंक्रीट के जंगलों के बीच गायब होती गौरैया को बचाने के लिए नवी मुंबई में अनोखी पहल शुरू हुई है। जानें कैसे आप भी बन सकते हैं इस मिशन का हिस्सा।
Save Sparrow Initiative Navi Mumbai
गौरैया (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Save Sparrow Initiative Navi Mumbai: बढ़ते शहरीकरण और तेजी से जंगलों की कटाई के कारण शहरों से गौरैया पक्षी धीरे-धीरे गायब ह रही हैं, वहीं 20 मार्च को मनाया जाने वाला 'वर्ल्ड स्पैरो डे' इस साल और भजरूरी हो गया है। हालांकि बहुत से लोग अभी भी इस दिन के बारे में नहीं जानते जो गौरैया के संरक्षण के लिए जागरूकत पैदा करने के लिए मनाया जाता है, लेकिन कुछ पर्यावरण संगठन पहल कर रहे हैं और सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

नवी मुंबई के वाशी में एक संगठन ने शहर में गौरैया के लिए घोंसले, पानी और भोजन का इंतजाम करके एक खास आंदोलन शुरू किया और सोशल मीडिया के जरिए नागरिकों में इस आंदोलन के बारे में जागरूकता पैदा की जा रही है।

गौरैया के लिए बनाए जा रहे खास घोंसले

कोरोना काल से ही वाशी में दिव्या वैभव गायकवाड फाउंडेशन के जरिए गौरैया संरक्षण के लिए एक खास अभियान चलाया जा रहा है। शुरुआत में इस संगठन से कुछ ही लोग जुड़े थे। हालांकि, पिछले कुछ सालों में वाशी में कई युवा इस संगठन से जुड़े हैं। इस संस्था के जरिए वाशी के सेक्टर एक से 6 की ग्रीन बेल्ट में गौरैया के लिए खास घोंसले बनाए जा रहे हैं और संस्था सुबह-शाम टहलने आने वाले नागरिकों से गौरैया को बचाने की अपील कर रही है।

यह पहल वर्ल्ड स्पैरो डे के मौके पर शुरू की गई है, और इसके साथ ही इस इलाके में गौरैया के लिए मिट्टी के पानी के बर्तन और बीज रखने के बर्तन लगाए गए है। इसके जरिए संस्था ने गर्मी के मौसम में पक्षियों के लिए सुरक्षित और अच्छा माहौल देने की कोशिश की है। इस पहल में बड़ी संख्या में नागरिकों ने हिस्सा लिया और गौरैया को बचाने का संकल्प लिया।

घरों के पास पक्षियों के लिए जगह बनाने की अपील

पिछले दो दशकों में शहरी इलाकों में गौरैया की संख्या कम हुई है, इसकी वजह कंक्रीट की इमारतों की वजह से घोंसले बनाने की जगह की कमी, मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन, फूड चेन में कमी, पेस्टीसाइड का ज्यादा इस्तेमाल और पानी की कमी है। जो गौरैया कभी आसानी से दिख जाती थीं, वे आज कम होती जा रही हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ी को गौरैया सिर्फ किताबों में ही देखनी पड़ेगी।

इसके लिए लोगों को अपने घरों के पास, छतों और बालकनी में आर्टिफिशियल घोंसले बनाने चाहिए और वहां रेगुलर पानी और बीज रखने चाहिए, इसके साथ ही, पेड़ लगाकर एक नेचुरल हैबिटेट बनाना चाहिए, ऐसी अपील फाउंडेशन की दिव्या गायकवाड़ ने की है।

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