सुप्रीम कोर्ट से विशाखा राउत को राहत, वार्ड 191 की सीट भरने पर रोक; जाति प्रमाणपत्र मामले में जल्द फैसला

Mumbai Mayor Vishakha Raut: पूर्व महापौर विशाखा राउत अयोग्यता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर दादर वार्ड 191 सीट भरने पर रोक लगाई। जाति प्रमाण पत्र अपील पर शीघ्र फैसले का निर्देश।
Relief for Vishakha Raut from the Supreme Court; stay on filling the Ward 191 seat
महापौर विशाखा राउत सोर्स- सोशल मीडिया
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Mumbai Ex Mayor Vishakha Raut Disqualification: मुंबई की पूर्व महापौर और शिवसेना (यूबीटी) नेता विशाखा राउत की नगरसेवक पद से अयोग्यता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई की।

न्यायालय ने उनकी याचिका पर नोटिस जारी करते हुए उनके पूर्व वार्ड क्रमांक 191, दादर पश्चिम-शिवाजी पार्क, की सीट को फिलहाल भरने पर रोक लगा दी है। यह रोक जाति प्रमाणपत्र से जुड़ी उनकी लंबित अपील पर निर्णय होने तक प्रभावी रहेगी।

जाति प्रमाणपत्र अपील पर जल्द फैसला

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कोंकण संभाग के संभागीय आयुक्त को राउत की लंबित वैधानिक अपील पर शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी कहा कि अपीलीय प्राधिकारी मामले का फैसला उसके गुण-दोष के आधार पर करेगा और हाई कोर्ट के पहले दिए गए आदेश से प्रभावित नहीं होगा।

ओबीसी महिला आरक्षित सीट से जीती थीं चुनाव

विशाखा राउत वार्ड 191 से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला के लिए आरक्षित सीट पर निर्वाचित हुई थीं। उनके निर्वाचन के लिए प्रस्तुत किए गए कुणबी ओबीसी जाति प्रमाणपत्र को लेकर बाद में विवाद खड़ा हुआ।

20 अगस्त को पालघर जिला जाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने राउत के कुणबी ओबीसी प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित कर दिया था। इसके बाद मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने उनकी नगरसेवक के रूप में सदस्यता स्वतः समाप्त मानते हुए वार्ड की सीट को रिक्त घोषित कर दिया।

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सीट भरने पर फिलहाल रोक

मुंबई बीएमसी की इस कार्रवाई के बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वार्ड 191 की रिक्त सीट को तत्काल भरने की प्रक्रिया पर रोक रहेगी। यह स्थिति तब तक कायम रहेगी, जब तक राउत की जाति प्रमाणपत्र संबंधी वैधानिक अपील पर संबंधित अपीलीय प्राधिकारी फैसला नहीं करता।

अदालत के निर्देश के अनुसार, अपील पर निर्णय लेते समय संबंधित प्राधिकारी को मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करना होगा।

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