

Uddhav Thackeray MLAs Meeting: महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर की अलकलों के बीच शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सांसदों के बाद अब विधायकों की बैठक बुलाई। शिवसेना (यूबीटी) ने अपने सभी विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को 22 जून को शाम 4 बजे मुंबई स्थित पार्टी कार्यालय 'शिवालय' में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।
शिवसेना (यूबीटी) के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु और MLC अनिल परब की ओर से लिखे पत्र में कहा गया कि शिवसेना (यूबीटी) विधायक दल के सभी सदस्यों की बैठक 22 जून को शाम 4 बजे मुंबई में मंत्रालय के सामने स्थित 'शिवालय' में बुलाई गई है। पार्टी प्रमुख उद्धव बालासाहेब ठाकरे इस बैठक में मार्गदर्शन करेंगे। आपसे अनुरोध है कि उक्त बैठक में समय पर उपस्थित हों। विधायक दल में विधानसभा और विधान परिषद दोनों के सदस्य शामिल है।
बता दें पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कि TMC में टूट के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी में टूट की अटकलें लगाई जा रही थी। इसी बीच उद्धव ठाकरे ने रविवार, 14 जून को सांसदों की बैठक बुलाई थी। 9 लोकसभा सदस्यों में से अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजभाऊ वाजे और संजय पाटिल व्यक्तिगत रूप से बैठक में शामिल हुए थे।
शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने बताया था कि ओमप्रकाश राजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश बापुराव पाटिल अष्टिकर और संजय देशमुख ने ऑनलाइन बैठक में भाग लिया, जबकि संजय जाधव ने फोन पर ठाकरे से बात की। बता दें कि शिवसेना (यूबीटी) के वर्तमान में 9 सांसद और 19 विधायक हैं।
शिवसेना (यूबीटी) की ओर से 12 जून को दावा किया गया था कि देश की राजनीति अब केवल अपने फायदे के सौदे तक सिमटकर रह गई है। 'दल-बदलने वाले नेताओं के बढ़ते चलन के बीच राजनीति अब निजी स्वार्थ का धंधा बनी' शीर्षक से शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि वोटर किसी खास पार्टी के चुनाव चिह्न और विचारधारा के आधार पर वोट देते हैं।
सामना में कहा कि गया वोटर पार्टी और विचारधारा के आधार पर वोट देकर उम्मीद करते हैं कि उन्हें सही प्रतिनिधित्व मिलेगा, लेकिन अपना फायदा देखने वाले राजनीतिक अवसरवादी नेता अपने निजी फायदे के लिए तुरंत एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कूद जाते हैं। ये अवसरवादी नेता और उनके लीडर कूदते-फांदते दिल्ली पहुंच जाते हैं।
संपादकीय में तर्क दिया गया कि जिस तरह अंगूर और आम की कई किस्में विकसित की गई हैं, उसी तरह इन अस्थिर नेताओं की भी नई नस्लें सामने आई हैं। इनमें सबसे आगे 'सयानी घोष' किस्म है।
पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान घोष ने अपने तीखे और जोशीले भाषणों से अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 'मिनी-ममता' की छवि बनाई, हर रैली में भाजपा पर निशाना साधा और ममता बनर्जी को अपनी मां जैसा माना। टीएमसी के सांसदों के बीच दरारें पड़ने लगीं तो बहुत कम लोगों की उम्मीद थी कि सयानी का भी नाम उस सूची में होगा।"