

Shiv Sena Symbol Case Supreme Court Shinde Faction Arguments: 'शिवसेना' पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर चल रहे विवाद में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट की ओर से दलीलें रखी गई। शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी में एकाधिकार बढ़ गया था और आंतरिक चुनाव नहीं कराए जा रहे थे। इसी असंतोष के कारण एकनाथ शिंदे ने पार्टी में बगावत की। कौल ने दावा किया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में पार्टी में लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हुई थी।
उनके अनुसार, पार्टी में नियुक्तियां लोकतांत्रिक तरीके से नहीं हुई और कई फैसले एक व्यक्ति के स्तर पर लिए गए। चुनाव आयोग की ओर से पार्टी में आंतरिक चुनाव कराने को लेकर बार बार कहा गया, लेकिन इन्हें आगे बढ़ाया जाता रहा। शिंदे गुट ने ये भी कहा कि बालासाहेब ठाकरे ने 1999 की पार्टी संविधान संबंधी प्रक्रिया में चुनाव आयोग के अधिकारों को स्वीकार। किया था। कौल के अनुसार, बाद में 2018 में पार्टी संविधान में किए गए बदलाव उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थे। इसलिए चुनाव आयोग ने उस संविधान को मान्यता नहीं दी।
कौल ने कहा कि शिवसेना ने भाजपा के साथ विधानसभा चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई गई। शिंदे गुट के अनुसार, पार्टी की मूल विचारधारा से अलग गठबंधन करने के कारण भी कार्यकर्ताओं और विधायकों में असंतोष बढ़ा।
बतौर कौल, चुनाव आयोग ने शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चिन्ह पर फैसला अचानक नहीं लिया। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज देखने के बाद निर्णय किया। शिंदे गुट ने इसी फैसले को सही ठहराया।
ठाकरे गुट पहले ही अपना पक्ष रख चुका है और धनुष-बाण चिन्ह नहीं मिलने की स्थिति में इसे फ्रीज करने की मांग कर चुका है। मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी। शिंदे गुट की ओर से अपात्रता, विधानसभा अध्यक्ष के फैसले और राजनीतिक दल तथा विधायी दल से जुड़े मुद्दों पर आगे दलीलें रखे जाने की संभावना है।
आंतरिक चुनाव नहीं कराने से नाराजगी
बालासाहेब ने माना था चुनाव आयोग का अधिकार
भाजपा से दगाबाजी, कांग्रेस से दोस्ती अस्वीकार
सुको में 15 सितंबर को अगली सुनवाई