मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस: HC ने ATS जांच पर उठाए सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की रिहाई पर रोक से किया इनकार

Mumbai Blasts: मुंबई लोकल ट्रेन में हुए बम धमाके के मामले में बड़ा अपडेट आया है। मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया।
Supreme Court on Mumbai Train Blast 2006 Bombay High Court Statement 7/11 Mumbai Blasts
7/11 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट पर SC सख्त (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Mumbai Train Blast 2006: 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले को फिलहाल किसी अन्य मामले में कानूनी मिसाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने इस मामले में 28 लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें से 13 को गिरफ्तार किया गया था। जुलाई 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 667 पन्नों के विस्तृत फैसले में सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

मकोका कोर्ट ने सुनाई थी मौत और उम्रकैद की सजा

इससे पहले सितंबर 2015 में विशेष मकोका (MCOCA) अदालत ने मामले में 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था। अदालत ने पांच आरोपियों को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि एक आरोपी को बरी कर दिया गया था। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था, जबकि दोषियों ने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की थी।

करीब एक दशक तक चली सुनवाई के बाद जुलाई 2025 में जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस श्याम सी. चंदक की विशेष पीठ ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इस दौरान कोविड-19 महामारी के समय एक आरोपी की जेल में मृत्यु भी हो गई थी।

ATS की जांच पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ATS की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने 11 आरोपियों के लगभग एक जैसे इकबालिया बयानों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए और माना कि इन बयानों से पहले आरोपियों ने हिरासत में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया था, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आतंकवाद-रोधी कानून लागू करने के लिए आवश्यक सरकारी मंजूरी के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध नहीं थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि किसी मामले को सुलझाने का केवल दिखावा करना समाज में न्याय की झूठी भावना पैदा करता है और इससे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर होता है।

जांच को लेकर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

इस मामले की जांच पर पहली बार 2008 में सवाल उठे थे, जब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दिल्ली और अहमदाबाद धमाकों की जांच के दौरान इंडियन मुजाहिद्दीन (IM) के सदस्य सादिक शेख को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, सादिक शेख ने दावा किया था कि 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों को इंडियन मुजाहिद्दीन ने अंजाम दिया था।

हालांकि, तत्कालीन ATS प्रमुख के. पी. रघुवंशी के नेतृत्व में जांच एजेंसी ने इस दावे को पर्याप्त सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया था और अपनी जांच में लश्कर-ए-तैयबा तथा सिमी (SIMI) की भूमिका को जिम्मेदार बताया था। बाद में वर्ष 2013 में भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किए गए इंडियन मुजाहिद्दीन के सह-संस्थापक यासीन भटकल ने भी पूछताछ के दौरान कथित तौर पर मुंबई ट्रेन धमाकों में IM की भूमिका का दावा किया था।

अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के पास

हाईकोर्ट के फैसले के बाद जब तत्कालीन ATS प्रमुख के. पी. रघुवंशी से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने मामले के न्यायालय में लंबित होने का हवाला देते हुए टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। वहीं, जांच से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि विशेष मकोका अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराया था, इसलिए मामले का अंतिम कानूनी निर्णय अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।

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