

Supreme Court Hearing Shiv Sena: महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल लाने वाले शिवसेना पार्टी नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह विवाद पर देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत इस मामले में ऐसा दूरगामी फैसला सुनाएगी जो भविष्य की राजनीति और कानूनी प्रक्रियाओं के लिए एक नजीर (मिसाल) के रूप में लागू होगा।
ठाकरे गुट (शिवसेना UBT) की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए।
कपिल सिब्बल ने दलील पेश करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने पार्टी के 2018 के संशोधित संविधान को नजरअंदाज किया। सिब्बल ने सवाल उठाया, "चुनाव आयोग का दावा है कि संशोधित संविधान रिकॉर्ड में नहीं था, लेकिन जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुच्छेद 29-A के तहत ऐसा कहां लिखा है कि हर संशोधन को दोबारा दर्ज करना अनिवार्य है? हमने सभी आवश्यक पत्र और संशोधन आयोग को सौंपे थे।"
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने जमीनी हकीकत और पार्टी के संगठनात्मक बहुमत को पूरी तरह से दरकिनार कर केवल विधायकों की संख्या बल को आधार बनाया, जो कि पूरी तरह अनुचित है।
सिब्बल ने आगे तर्क दिया कि जब तक विधायकों की अयोग्यता पर विधानसभा अध्यक्ष का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक चुनाव आयोग को पार्टी नाम और निशान आवंटित करने से बचना चाहिए था।
उन्होंने कहा, "अयोग्यता की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान ही आयोग ने शिंदे गुट को सिंबल दे दिया। जब अयोग्यता पर निर्णय में देरी होती है, तो सत्ता में बैठे लोग चुंबक की तरह अन्य विधायकों को आकर्षित कर लेते हैं। 31 विधायकों की संख्या 39 और फिर 56 तक पहुंच जाती है। अगर इस प्रवृत्ति को स्वीकार कर लिया गया, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए बेहद खतरनाक होगा।"
कपिल सिब्बल द्वारा चुनाव आयोग और पांच जजों की संविधान पीठ के पिछले संदर्भों को सामने रखने के बाद शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले के संवैधानिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है और अदालत ऐसा स्पष्ट कानूनी सिद्धांत तय करेगी जो भविष्य में राजनीतिक दलों के विभाजन और सिंबल विवादों पर हमेशा के लिए लागू होगा। इस हाई-प्रोफाइल सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।