छात्रों को मारने पर शिक्षकों पर कार्रवाई, तो पुलिस पर क्यों नहीं? दिल्ली में लाठीचार्ज से भड़के राज ठाकरे

Raj Thackeray On Student Protest: दिल्ली में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर भड़के राज ठाकरे। MNS प्रमुख ने सवाल उठाया- अगर छात्रों को मारने पर शिक्षकों पर कार्रवाई होती है, तो दोषी पुलिस पर क्यों नहीं?
raj thackeray on delhi police lathicharge on students
राज ठाकरे का बयान (सोर्स: डिजाइन फोटो)
Published on
Updated on

Raj Thackeray On Delhi Police: दिल्ली में नीट परीक्षा में हुई धांधली के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए पुलिसिया लाठीचार्ज ने देशव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया है। इस गंभीर मुद्दे पर अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने अपने तेवर में प्रतिक्रिया दी है। ठाकरे ने सीधे तौर पर सरकार, पुलिस प्रशासन और यहां तक कि न्यायपालिका की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठाए हैं।

राज ठाकरे ने एक बहुत ही बुनियादी लेकिन चुभता हुआ सवाल पूछा है। उन्होंने कहा कि यदि किसी स्कूल में शिक्षक छात्रों को मारते हैं, तो उनके खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाती है। फिर दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों को बेरहमी से पीटने वाले पुलिसकर्मियों और उन्हें ऐसे आदेश देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? ठाकरे के अनुसार, जिस तरह शिक्षकों को छात्रों को शारीरिक दंड देने का अधिकार नहीं है, वैसा ही प्रतिबंध पुलिस पर भी लागू होना चाहिए, क्योंकि न्यायपालिका के अलावा किसी को भी किसी व्यक्ति को शारीरिक सजा देने का अधिकार नहीं है।

आंदोलन की जड़, लाखों छात्रों का भविष्य

ठाकरे ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन कोई साधारण विरोध नहीं था, बल्कि NEET परीक्षा में हुई भारी गड़बड़ी का परिणाम था, जिसने देश के लाखों छात्रों के भविष्य को संकट में डाल दिया है। इसी हताशा और गुस्से के कारण छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए। ठाकरे का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए नहीं, बल्कि किसी प्रतिशोध की भावना से लाठीचार्ज किया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस न केवल प्रदर्शनकारियों को, बल्कि आसपास के निर्दोष लोगों को भी बेरहमी से कुचल रही थी।

अंतरराष्ट्रीय मानकों और संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन

राज ठाकरे ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित मानवाधिकारों से भी जोड़ा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल के नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य द्वारा बल प्रयोग तभी होना चाहिए जब वह संवैधानिक रूप से आवश्यक, प्रपोर्शनल हो और उसकी जवाबदेही तय हो। उन्होंने नॉर्वे, जर्मनी, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों का उदाहरण दिया, जहां पुलिसिया बल प्रयोग होने पर आदेश देने वाले अधिकारियों की कड़ी जांच की जाती है। ठाकरे ने सवाल उठाया कि क्या भारत में व्यवस्था संविधान से भी ऊपर हो गई है?

न्यायपालिका और सरकार से निराशा

ठाकरे ने देश की सर्वोच्च अदालत के रुख पर भी गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एक तरफ तो छात्रों को कॉकरोच कहा जा रहा है, और दूसरी तरफ अदालत यह कह रही है कि उनके पास मारपीट के वीडियो देखने का समय नहीं है। उन्होंने कहा कि जब मौजूदा सरकार से युवाओं की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तभी वे सड़कों पर उतरते हैं।

लोकतंत्र की असली पहचान

अपने बयान के अंत में राज ठाकरे ने लोकतंत्र की एक नई परिभाषा सामने रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह विरोध को कितनी सख्ती से कुचलता है, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह विरोध की आवाज को कितने संयम और दूरदर्शिता के साथ सुनता और संभालता है। उन्होंने सिविल सोसाइटी और सांसदों से अपील की है कि वे इस दमनकारी नीति के खिलाफ संसद में आवाज उठाएं।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com