मुंबई में मानसून लेट, छाता कारोबारी वेट! अम्ब्रेला की सेल्स में 25% की आई गिरावट

Mumbai Umbrella Business: मुंबई में देर से बारिश आने से छाता कारोबार 25% घटा है। बाजार सज चुके हैं, लेकिन बिक्री उम्मीद से कम है। कारोबारी अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।
Mumbai Umbrella Business Hit By Delayed Monsoon Rains
मुंबई अंम्ब्रेला मार्केट (सोर्स:AI)
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Mumbai Umbrella Business Hit By Delayed: बरसात का इंतजार सिर्फ किसान ही नहीं कर रहे हैं बल्कि एक ऐसा वर्ग भी है जिसकी आजीविका बरसात के भरोसे ही चलती है। एक पखवाड़े के बाद बारिश दस्तक दे चुकी है लेकिन अम्ब्रेला कारोबारी अब भी मायूस दिख रहे हैं। अम्ब्रेला कारोबारियों की माने तो जून महीने में ही अम्ब्रेला की पूरे साल की बिक्री हो जाती थी। इस साल बरसात नहीं होने के चलते अम्ब्रेला कारोबार में 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। रविवार को जहां बाजार अम्ब्रेला और रेनकोट की खरीदारी के लिए सज चुका है, वही बाजार में खरीददारों की भी खूब भीड़ रही।

बरसात नहीं होने से इस बार स्कूल खुलने के काफी समय बाद अभिभावक बच्चों के लिए रेनकोट की खरीद रहे हैं वहीं ऑफिस जाने वाले लोग बारिश से बचने के लिए डिफरेंट रेनकोट और रेनसूट खरीद रहे हैं। छतरी बारिश का सबसे जरूरी साथी है इसलिए इसे खरीदते समय ग्राहक उसके रंग और डिजा़इन पर ख़ास ध्यान दे रहे हैं।

इंडियन अम्ब्रेला चाइना की अम्ब्रेला से ज्यादा मजबूत हैं

कालबादेवी रोड में अंजनी अंब्रेला के साथ रेनकोट का कारोबार करने वाले दीपक टोपीवाला ने बताया कि ग्राहकों में इंडियन अम्ब्रेला की मांग अधिक रहती है जो चाइना निर्मित अंब्रेला की अपेक्षा अधिक मजबूत रहते हैं। उन्होंने कहा कि मुंबई के नजदीक भिवंडी, वसई, उमरगाम जैसे कई जगहों पर करीब 5 हजार कारीगर देशी मटेरियल के साथ छाता बना रहे हैं जिसकी सप्लाई मुंबई के अलावा देश के कई हिस्सों में की जाती है। छातों में लगने वाला सलिया कोलकाता से मंगाया जाता है।

बच्चों के छातों में जहां कई कार्टून करेक्टर को स्थान दिया जाता है वही बड़े छातों में हैंडल के ग्रिप के साथ मजबूती का ख्याल रखा जाता है। पहले काले छाते आते थे जो बड़े होते थे और उन्हें फोल्ड नहीं किया जा सकता था। बुजुर्गों के लिए ये छाते छड़ी की तरह सहारा देने का काम भी करते थे। अब थ्री फोल्डिंग छाते आते हैं, इन्हें मोड़ कर आसानी से बैग में रखा जा सकता है।

सन अम्ब्रेला के सुनील ने कहा कि छाता उद्योग अभी भी पूरी तरह चीन पर निर्भर है। छाता बनाने में लगने वाले सभी सामग्री चीन से मंगाए जाते हैं। देश में टेक्सटाइल्स सेक्टर आर्मी के लिए पैराशूट के कपड़े तो बना लेती है लेकिन छाता में लगने वाले कपड़े बनाने में कोई रूचि नहीं लेती। सन अम्ब्रेला करीब 100 वर्षों से छाता उद्योग में हैं। इस क्षेत्र में तेजी से बदलाव हुआ है। पहले बंबू और कॉटन का छाता होता था।

अब लोहे, एल्यूमीनियम, फाइबर ग्लास का डंडा बनाया जाता है। 17 इंच से 33 इंच तक के साइज में छाता बनाया जाता है। ब्लैक कलर से अब कई रंगीन प्रिंट कलर में छाते बनाये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि छाता सीजनल प्रोडक्ट है। बरसात के समय ही छाते को याद किया जाता है।

छाता अनेकों राज्यों में बनने लगी हैं

छाता बनाने की सामग्री अब देश के कई राज्यों में बनाई जाने लगी है। इनका उपयोग लोकल ब्रांडों में किया जाता है। राजस्थान में छाता के हैंडल, सलिया, स्प्रिंग को बनाया जाता है। आल बाम्बे अम्ब्रेला मैन्युफैक्चरिंग सोसायटी के मुताबिक कई राज्यों में छाता बनाने का कच्चा माल तैयार किया जाता है। 28 इंच का छाता सिंगल फोल्ड का होता है जबकि 24 इंच में 2 फोल्ड और 3 फोल्ड का छाता बनाया जाता है।

छातों पर आयातित पॉलिस्टर या नायनॉल के कपड़े लगाए जाते हैं। छाता निर्माण के सभी सामग्री क्रॉफर्ड मार्केट में मिलता है। उन्होंने कहा कि छाता बनाने का कारोबार 5 से 6 महीनों का है। केरल में सबसे पहले बरसात होती है उसके बाद देश के अलग अलग राज्यों में सितंबर तक बरसात होती है। छाता बनाने वाले कारीगरों को पीस के हिसाब से पैसा दिया जाता है।

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