गैस संकट से मजदूरों का पलायन तेज, मुंबई में भोजन संकट, लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर यात्रियों की भीड़

Mumbai LPG Gas Crisis: मुंबई में एलपीजी गैस संकट के कारण दिहाड़ी मजदूरों और ऑटो चालकों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है, जिसके चलते कई मजदूर गांव लौटने लगे हैं।
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Migrant Workers Leaving Mumbai (सोर्सः सोशल मीडिया)
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Migrant Workers Leaving Mumbai: लोकमान्य तिलक टर्मिनस से पटना की ओर जाने वाली राजगीर एक्सप्रेस में यात्रियों के लिए पैसेंजर-गायक का स्मारक देखा जा रहा है। ऐसा दृश्य आम तौर पर त्योहारों या गर्मी के परिदृश्यों के दौरान दिखाई देता है, लेकिन इस बार मार्च महीने में ही गांव में आने वाले यात्रियों की भारी भीड़ स्टेशनों पर देखने को मिल रही है। जनरल वैभवशाली गांव में लंबी कतारों में रहने वाले यात्रियों का कहना है कि गैस की कमी के कारण वे वापस लौटने को मजबूर हो गए हैं।

मुंबई से उत्तर भारत की ओर जाने वाली यात्रियों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है। दानापुर जाने वाले रामलाल महतो अपने परिवार के साथ गांव लौट रहे हैं। वे वसई की एक कंपनी में काम कर परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे। उन्होंने बताया कि गैस न मिलने के कारण पिछले एक सप्ताह से घर में लकड़ी का कोयला बनाना पड़ रहा है, जिससे पूरे घर में धुआं भर जाता है।

400 रुपये दिहाड़ी

वहीं आरा जिले से अपने गांव लौटते हुए राकेश ने बताया कि गैस की दुकान अब साफ दिखाई दे रही है। जिस होटल में उन्होंने खाना खाया, वह भी बंद हो गया। उन्होंने कहा, ''हम मेहनत करने वाले लोग हैं, अगर खाना नहीं खाया तो बीमार पड़ जायेंगे।'' बिल्डिंग में शटरिंग का काम करने वाले सोमारू ने बताया कि उन्हें रोजाना 400 रुपये दिहाड़ी मिलते हैं। छोटा सा सामान महंगा हो गया और लकड़ी के लिए भी आसानी से नहीं मिल रही। अधिकांश दिहाड़ी पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि गैस की कमी के कारण होटल वालों ने खाने के दाम बढ़ाए हैं। ऐसे में अगर ज्यादा पैसा खाने में खर्च हो गया, तो बचत कैसे होगी। लोकमान्य तिलक टर्मिनस के कुलियों के अनुसार इस बार बिहार और उत्तर प्रदेश की ओर जाने वाली ट्रेनों में यात्रियों की भीड़ बढ़ गई है।

क्लास के चूल्हे ने जगाई आस

अंधेरी और जोगेश्वरी क्षेत्र में स्तिथ गैस दोषियों की कमी का असर अब साफ दिखने लगा है। यहां बड़ी संख्या में ऑटो-ड्राइवर स्थानीय भोजनालयों पर निर्भर रहते हैं, जहां वे दोपहर और रात का भोजन करते हैं। गैस की कमी के कारण कई भोजनालय बंद हो गए। सेंट निकोलस वाडी स्थित एक शुद्ध शाकाहारी भोजनालय के संचालक अजीत यादव ने बताया कि गैस की कमी के कारण दो दिन तक उन्हें यहां खाना नहीं मिला। अब वे सिया की भट्टी पर दाल-चावल बनाकर लोग खाना खा रहे हैं।

स्ट्रीट फूड स्टॉल बंद

चित्रांकन के अलावा क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक वर्ग भी लंबी कतारों में स्टॉक लेकर भोजन ले रहे हैं। पहले जहां दाल, चावल, सब्जी और रोटी मिलती थी, अब गैस की कमी के कारण सिर्फ दाल-चावल ही मिल रहा है। पहले 70 रुपये में भरपेट भोजन मिल जाता था, जो अब 80 रुपये तक पहुंच गया है।

स्थानीय निवासी रमेशचंद्र ने बताया कि पिछले एक सप्ताह से गैस न मिलने के कारण वे बाहर खाना बनाने की दुकान कर रहे हैं और घर के लिए सामाग्री लेकर जा रहे हैं। गैस की भारी कमी और कालाबाजारी पर रोक के चलते क्षेत्र के कई छोटे होटल और स्ट्रीट फूड स्टॉल बंद हो गए हैं, जबकि कुछ होटलों में ब्लैक में खरीदकर किसी तरह अपना काम चला रहे हैं।

(इनपुट: गंगाराम विश्वकर्मा)

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