

Raj Thackeray Railway Recruitment Protest Verdict: साल 2008 में महाराष्ट्र के कल्याण रेलवे स्टेशन पर रेलवे भर्ती परीक्षा देने आए उत्तर भारतीय उम्मीदवारों के खिलाफ मनसे (MNS) कार्यकर्ताओं ने एक उग्र आंदोलन छेड़ दिया था। मनसे का आरोप था कि बाहरी राज्यों के प्रवासी उम्मीदवार स्थानीय मराठी युवाओं के रोजगार और नौकरियों को छीन रहे हैं। इस आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और मारपीट हुई थी, जिससे रेलवे को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था। तत्कालीन सरकार ने इस हिंसा और उकसावे के पीछे सीधे तौर पर राज ठाकरे के भाषणों को जिम्मेदार मानते हुए उनके और अन्य मनसे नेताओं के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था।
यह मामला शुरुआत में कल्याण कोर्ट में चल रहा था, लेकिन बाद में इसे ठाणे रेलवे कोर्ट और फिर सत्र न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। पिछले 18 सालों से इस संवेदनशील मामले पर कानूनी बहस चल रही थी। बीच में कोर्ट में हाजिर न होने के कारण राज ठाकरे के खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी हुआ था, जिसे बाद में उनके वकीलों ने रद्द करवाया था। आज कोर्ट ने रेलवे भर्ती परीक्षा आंदोलन मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सरकारी पक्ष कोई भी दस्तावेजी या प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं कर पाया।
अदालत का फैसला आते ही कोर्ट रूम के भीतर मौजूद मनसे कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर दौड़ गई। इस राहत भरे फैसले के बाद राज ठाकरे के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान देखी गई। कोर्ट से बाहर निकलते समय अपनी चिरपरिचित शैली में तंज कसते हुए राज ठाकरे ने मराठी की एक मशहूर कहावत का जिक्र किया और कहा, "अस्वलाच्या अंगावरचा एक केस कमी झाला" (यानी भालू के शरीर से एक बाल कम हो गया, मुझ पर ऐसे झूठे मुकदमों से कोई फर्क नहीं पड़ता)।
राज ठाकरे के बरी होने के बाद मनसे के कद्दावर नेता अविनाश जाधव ने कोर्ट परिसर के बाहर मीडिया से बातचीत की। जाधव ने कहा, "यह पूरी तरह से सत्य की जीत है। साल 2008 में जब मराठी युवाओं के हक के लिए आंदोलन हुआ, तो तत्कालीन सत्ताधारी सरकार ने जानबूझकर राज साहब की लोकप्रियता को दबाने के लिए उन्हें इस मामले में झूठा फंसाने की राजनीतिक साजिश रची थी। आज अदालत ने साफ कर दिया है कि हमारे नेताओं का हिंसा से कोई लेना-देना नहीं था।"
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 18 साल पुराने इस केस से पूरी तरह बरी होना राज ठाकरे और मनसे के लिए एक बड़ा बूस्टर डोज साबित होगा। महाराष्ट्र के आगामी राजनीतिक समीकरणों और स्थानीय निकाय चुनावों के बीच इस फैसले से मनसे को अपने 'मराठी मानुष' और 'पुत्र-अधिकार' (Sons of the Soil) वाले एजेंडे को जनता के बीच दोबारा आक्रामक रूप से ले जाने की कानूनी और नैतिक ताकत मिल गई है।