महायुति सरकार के मंत्री मंत्रालय से गायब! बंगलों में फाइलों का अंबार; क्या अफसरों के हाथ में है राज्य की कमान?

Maharashtra News: महाराष्ट्र की महायुति सरकार के मंत्रियों की मंत्रालय से अनुपस्थिति ने प्रशासनिक कामकाज पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बंगलों से चल रही फाइलों और बढ़ते अफसरशाही के प्रभाव पर बड़ा खुलासा।
Maharashtra Ministers Missing From Mantralaya
महाराष्ट्र मंत्रालय (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Maharashtra Ministers Missing From Mantralaya: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिल रही है। राज्य का पावर सेंटर कहे जाने वाले 'मंत्रालय' में मंत्रियों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, जबकि उनके सरकारी बंगलों पर फाइलों का अंबार लगा है। रिपोर्टों के अनुसार, महायुति सरकार के कई मंत्री कैबिनेट बैठकों के अलावा मंत्रालय का रुख तक नहीं कर रहे हैं। वे अपने निजी या सरकारी बंगलों से ही पूरा कामकाज संभाल रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था का संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।

मंत्रालय का स्टाफ भी 'फील्ड' पर

हैरानी की बात यह है कि मंत्रियों की गैरमौजूदगी के कारण मंत्रालय का आधे से ज्यादा स्टाफ भी मंत्रियों के बंगलों पर ही तैनात रहता है। इससे आम जनता, जो दूर-दराज के जिलों से अपने काम लेकर मंत्रालय पहुंचती है, उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है। हाल ही में नरहरी झिरवल के कार्यालय में हुई एसीबी की कार्रवाई ने इस मुद्दे को और हवा दे दी है। आरोप लग रहे हैं कि मंत्रियों की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर बड़े अधिकारी ही नीतिगत फैसले ले रहे हैं।

लाखों का रिनोवेशन, फिर भी दफ्तरों से दूरी

सरकार बनने के बाद मंत्रियों के आलीशान दफ्तरों को सजाने और संवारने के लिए जनता के टैक्स के लाखों रुपये खर्च किए गए। नए फर्नीचर से लेकर हाई-टेक सुविधाओं तक, सब कुछ मुहैया कराया गया। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि जब मंत्रियों को अपने बंगलों से ही काम करना था, तो दफ्तरों पर इतना खर्च क्यों किया गया? चुनाव के बहाने निर्वाचन क्षेत्रों में डटे रहने वाले मंत्रियों ने अब मंत्रालय को महज एक 'औपचारिकता' बना दिया है।

विपक्ष ने सरकार पर उठाए सवाल

मंत्रियों के गायब रहने से राज्य की प्रशासनिक जवाबदेही पर संकट खड़ा हो गया है। विपक्ष ने महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए पूछा है कि "यदि मंत्री मंत्रालय में नहीं हैं, तो प्रशासन पर नियंत्रण किसका है?" महत्वपूर्ण फाइलों के निपटारे में देरी हो रही है और पारदर्शिता की कमी साफ नजर आ रही है। जानकारों का मानना है कि जब फैसले केवल अधिकारियों के हाथ में चले जाते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है।

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