पैठणी के 2000 साल पुराने गौरव को 'कार्या' ने दी नई उड़ान; येवला के बुनकरों की कला अब वैश्विक मंच पर छाएगी

Kaarya Paithani News: मुंबई में आयोजित होने वाले 'कार्या' शोकेस के जरिए महाराष्ट्र की विरासत पैठणी और येवला के कारीगरों की अनकही कहानियों को आधुनिक डिजिटल और वैश्विक मंच पर जीवंत किया जा रहा है।
Paithani Silk Heritage 2026
नासिक के येवला स्थित कापसे पैठणी के सदस्यों के साथ कार्या की टीम (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Paithani Silk Heritage 2026: भारतीय वस्त्र परंपरा में 'पैठणी' केवल एक रेशमी साड़ी का नाम नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की 2000 वर्ष पुरानी उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसे राजाओं का संरक्षण मिला और जिसे पीढ़ियों ने सहेज कर रखा। इसी समृद्ध विरासत को एक बार फिर आधुनिक संदर्भों में जीवित करने का बीड़ा उठाया है 'कार्या' (Kaarya) के महाराष्ट्र अध्याय ने। यह पहल केवल फैशन तक सीमित नहीं है, बल्कि येवला के उन गुमनाम नायकों की कहानी है, जिनकी उंगलियां करघों पर इतिहास बुनती हैं।

25-26 अप्रैल को मुंबई में महासंगम

विव्ज़ फैशन स्कूल की यह अनूठी पहल 25 और 26 अप्रैल, 2026 को मुंबई के प्रतिष्ठित छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय में एक भव्य शोकेस के रूप में सामने आएगी। यहाँ पैठणी को महज एक परिधान के रूप में नहीं, बल्कि 'फाइन आर्ट' के रूप में एक व्यवस्थित म्यूजियम स्टाइल में पेश किया जाएगा। इस आयोजन में अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांड्स और विरासत प्रेमी एक साथ जुटेंगे।

येवला के करघों से मुंबई के रैंप तक

मुंबई के मुख्य आयोजन से पहले 'कार्या' की टीम ने नासिक के येवला स्थित 'कापसे पैठणी' और अन्य बुनकर समुदायों के साथ जमीनी स्तर पर काम किया है। पैठणी को 'क्वीन ऑफ सिल्क्स' कहा जाता है, लेकिन इसके पीछे की जटिल प्रक्रिया से दुनिया अनजान है। असली चांदी के तारों पर सोने की परत चढ़ाकर बनी ज़री और शुद्ध मलबेरी सिल्क का संगम इसे अनमोल बनाता है। यहाँ डिजाइन कपड़े के ऊपर काढ़ा नहीं जाता, बल्कि बुनाई के दौरान ही धागे-दर-धागे मोर, कमल और अजंता की गुफाओं से प्रेरित ज्यामितीय आकृतियां उभारी जाती हैं। एक पैठणी तैयार करने में हफ्तों से लेकर महीनों का समय लगता है।

कारीगर: कला के असली केंद्र बिंदु

'कार्या' का दर्शन स्पष्ट है- कारीगर फैशन उद्योग का छोटा हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी नींव हैं। इस अभियान के तहत येवला के कारीगर स्वयं मुंबई के मंच पर मौजूद रहेंगे। वे न केवल अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे, बल्कि अपनी पीढ़ियों के अनुभव को वैश्विक दर्शकों के साथ साझा भी करेंगे। यह उनके लिए सिर्फ बाजार ढूंढने की कोशिश नहीं है, बल्कि उस सम्मान को वापस पाने की लड़ाई है, जिसके वे हकदार हैं।

विस्तार नहीं, गहराई पर जोर

अक्सर फैशन शो में विविधता पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन 'कार्या' के महाराष्ट्र अध्याय ने केवल पैठणी पर ध्यान केंद्रित कर इसकी गहराई को टटोला है। पारंपरिक तकनीकों को बिना छेड़े, उन्हें आज के वैश्विक मानकों के अनुरूप कैसे पेश किया जाए, यही इस पहल का मुख्य उद्देश्य है।

अगला पड़ाव: मध्य प्रदेश की चंदेरी

महाराष्ट्र की इस गौरवशाली यात्रा के बाद 'कार्या' का अगला पड़ाव मध्य प्रदेश होगा, जहां चंदेरी की बारीकियों को दुनिया के सामने लाया जाएगा। अलग-अलग राज्यों से गुजरते हुए यह सफर अंततः मुंबई में एक 'ग्रैंड फिनाले' के रूप में संपन्न होगा, जहां भारतीय टेक्सटाइल की पूरी तस्वीर एक साथ दिखाई देगी।

इस पहल का दीर्घकालिक लक्ष्य नई पीढ़ी के बुनकरों में अपनी कला के प्रति गर्व पैदा करना और उपभोक्ताओं को 'स्लो फैशन' एवं 'विरासत' की असली कीमत समझाना है।

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