'आवश्यकता आविष्कार की जननी', LPG संकट में कचरे से बनाया रसोई का ईंधन, IIT बॉम्बे के छात्रों ने किया कमाल

IIT Bombay Waste to Energy: IIT बॉम्बे ने सूखे पत्तों और जैविक कचरे से रसोई गैस बनाने की तकनीक विकसित की है। इससे कैंटीन में LPG की खपत 40% तक कम हुई है और लाखों की बचत हो रही है।
Biomass Gasifier Technology IIT Bombay
Biomass Gasifier Technology IIT Bombay (फोटो क्रेडिट-X)
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LPG Crisis Solution: खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव और एलपीजी (LPG) की अनिश्चित सप्लाई के बीच IIT बॉम्बे ने आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने सूखे पत्तों और जैविक कचरे से किचन का ईंधन बनाने की एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है।

लगभग 10 साल के कड़े शोध के बाद तैयार इस 'वेस्ट-टू-एनर्जी' मॉडल ने कैंपस की एलपीजी पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर दिया है।

कचरे से ऊर्जा: कैसे काम करती है यह तकनीक?

IIT बॉम्बे का कैंपस 550 एकड़ में फैला है, जहाँ हर दिन भारी मात्रा में सूखे पत्ते और टहनियाँ गिरती हैं। पहले इस कचरे को हटाना एक खर्च भरा काम था, लेकिन अब इसे ही संसाधन बना लिया गया है।

पेलट्स निर्माण: सबसे पहले सूखे पत्तों और भूसे को छोटे-छोटे पेलट्स (Pellets) में बदला जाता है।

बायोमास गैसीफायर: इन पेलट्स को एक विशेष मशीन में डाला जाता है, जहाँ इन्हें जलाया नहीं जाता, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के जरिए गैस और भाप में बदला जाता है।

कुकिंग गैस: इसी भाप और गैस का उपयोग अब कैंपस की कैंटीन में खाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

चुनौतियों भरा सफर और टीम की जीत

इस प्रोजेक्ट की नींव साल 2014 में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में रखी गई थी। उनके साथ डॉ. सुजीत देवरे और डॉ. प्रबोध गडकरी भी शामिल थे। शुरुआती दौर में मशीन से धुआं निकलना और 'क्लिंकर' (ठोस अवशेष) जैसी तकनीकी बाधाएं आईं, जो मशीन को जाम कर देती थीं। 2017 तक इन समस्याओं को सुलझा लिया गया और एनर्जी साइंस विभाग के प्रोफेसर संदीप कुमार ने एक बेहतर बर्नर डिजाइन किया। अंततः 2024 में इसे सफलतापूर्वक लागू कर दिया गया।

आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ

इस तकनीक के परिणाम चौंकाने वाले हैं, LPG की बचत- कैंटीन में गैस की खपत 30-40% तक कम हो गई है। पैसों की बचत- संस्थान का अनुमान है कि बड़े स्तर पर लागू होने पर हर साल करीब 50 लाख रुपये की बचत होगी। पर्यावरण संरक्षण- इस मॉडल से सालाना करीब 300 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होने की उम्मीद है। सुरक्षा- गैस लीकेज या ब्लास्ट जैसी दुर्घटनाओं का खतरा भी शून्य हो जाता है।

IIT बॉम्बे ने इस तकनीक का लाइसेंस इनफिक्सेन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को दिया है ताकि इसे हॉस्टल मेस और अन्य बड़े उद्योगों तक पहुँचाया जा सके। यह मॉडल न केवल कचरा प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण है, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक बड़ा कदम भी है।

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