

Harshwardhan Sapkal Electricity Bill: महाराष्ट्र सरकार द्वारा किसानों के लिए घोषित की गई बिजली बिल माफी योजना को लेकर विपक्षी दलों ने तीखा हमला बोलना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक हर्षवर्धन सपकाल ने महायुति (BJP-शिवसेना-NCP) सरकार के इस फैसले के पीछे एक बड़ा और बेहद चौंकाने वाला छुपा हुआ एजेंडा होने का दावा किया है।
सपकाल के अनुसार, यह लोक-लुभावन घोषणा वास्तव में अन्नदाताओं के कल्याण के लिए नहीं की गई है, बल्कि यह महाराष्ट्र राज्य बिजली वितरण कंपनी (MSEB/MSEDCL) की वित्तीय रीढ़ तोड़ने और अंततः इसे उद्योगपति गौतम अडानी के हाथों में सौंपने की एक सोची-समझी साजिश है। इस बयान के बाद राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एक नया विवाद खड़ा हो गया है।
हर्षवर्धन सपकाल ने सरकार की मंशा पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि बाहर से बेहद आकर्षक दिखने वाली इस योजना के पीछे एक गंभीर वित्तीय संकट छिपा हुआ है। सरकार ने बिना किसी पूर्व वित्तीय योजना या बजट आवंटन के किसानों के बिजली बिल माफ करने की बड़ी-बड़ी बातें तो कर दी हैं, लेकिन इसके एवज में बिजली कंपनियों को मिलने वाली सब्सिडी की भरपाई सरकार कैसे करेगी, इस पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है।
सपकाल ने आरोप लगाया कि पहले से ही भारी कर्ज के बोझ तले दबी राज्य की सरकारी बिजली कंपनियों (महावितरण) को इस फैसले से और अधिक वित्तीय नुकसान होगा। जब ये कंपनियां पूरी तरह से दिवालिया और पंगु हो जाएंगी, तब सरकार वित्तीय घाटे और अक्षमता का बहाना बनाकर इस पूरे सरकारी बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को निजी हाथों में, विशेषकर अडानी समूह को बेहद कौड़ियों के दाम में बेचने का रास्ता साफ करेगी।
कांग्रेस नेता ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अगर सरकार सचमुच किसानों की मदद करना चाहती है, तो उसे सिंचाई के लिए नियमित और निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। वर्तमान में राज्य के ग्रामीण इलाकों, विशेषकर विदर्भ और मराठवाड़ा में किसान भारी लोडशेडिंग और बिजली कटौती का सामना कर रहे हैं। रात के समय बिजली दिए जाने के कारण किसानों को अपनी जान जोखिम में डालकर खेतों में जाना पड़ता है।
सपकाल ने कहा कि कृषि पंपों के लिए मुफ्त बिजली देने की घोषणा केवल आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया एक चुनावी स्टंट है। असल में, इस योजना की आड़ में महाराष्ट्र के लाखों उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ डाला जाएगा और सरकारी संपत्तियों को अपने पसंदीदा उद्योगपतियों के हवाले कर दिया जाएगा। उन्होंने जनता और किसान संगठनों से सरकार की इस 'निजीकरण नीति' के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की है।