

Bombay High Court On Ramesh Mhatre: महाराष्ट्र के ठाणे जिले में डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों के साथ खुलेआम मारपीट करने के आरोपी शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को बॉम्बे हाई कोर्ट से बहुत बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने डोंबिवली के एक निजी अस्पताल में एक महिला डॉक्टर समेत अन्य स्टाफ से अभद्रता और हिंसा करने के आरोपी पार्षद म्हात्रे की सेशंस कोर्ट से मिली जमानत पर लगी रोक हटाने से साफ इनकार कर दिया है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते म्हात्रे का यह आचरण पूरी तरह से अस्वीकार्य और गंभीर है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे हिंसक आचरण के लिए आरोपी को अभी कुछ और समय जेल में ही रहना चाहिए।
सुनवाई के दौरान रमेश म्हात्रे की ओर से पेश प्रसिद्ध अधिवक्ता सना रईस खान ने अदालत के सामने दलील दी कि उनके मुवक्किल 73 वर्ष के बुजुर्ग हैं और वे कई तरह की गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस जांच पूरी हो चुकी है और अब हिरासत की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। वायरल वीडियो का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा, "मारपीट की जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, उसमें म्हात्रे की हरकतें किसी 73 साल के बुजुर्ग व्यक्ति जैसी नहीं, बल्कि किसी 25 साल के बेकाबू युवक जैसी नजर आ रही हैं। सिर्फ उम्र का हवाला देकर इतने गंभीर अपराध में राहत नहीं दी जा सकती।"
यह पूरा विवाद 6 जुलाई का है, जब एकनाथ शिंदे की शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे अपने दर्जनों समर्थकों के साथ डोंबिवली स्थित एक निजी अस्पताल में जबरन घुस गए। आरोप है कि एनआईसीयू (NICU) सुविधा पूरी तरह फुल होने के कारण जब अस्पताल प्रशासन ने एक नवजात शिशु को भर्ती करने में असमर्थता जताई, तो म्हात्रे ने आपा खो दिया और दो डॉक्टरों व महिला कर्मचारियों के साथ मारपीट की।
अदालत में म्हात्रे ने अपनी सफाई में दावा किया कि उन्होंने महिला डॉक्टर पर सीधा हमला नहीं किया था, बल्कि केवल उनका मोबाइल फोन छीनने के लिए हाथ पर थप्पड़ मारा था क्योंकि वह बात नहीं सुन रही थीं। हालांकि, अदालत ने इस दलील को कतई वाजिब नहीं माना।
घटना के दो दिन बाद म्हात्रे को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसके बाद 14 जुलाई को निचले सेशंस कोर्ट से उन्हें जमानत मिल गई थी। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जमानत रद्द कर म्हात्रे को तुरंत सरेंडर करने के निर्देश दिए थे। आदेश के बाद म्हात्रे ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया, जहां से कल्याण कोर्ट ने उन्हें 3 अगस्त तक के लिए न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधियों का मूल कर्तव्य समाज की सेवा करना है, न कि नागरिकों और कोरोना व स्वास्थ्य योद्धाओं पर हमला करना। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी है, तब तक पार्षद को सलाखों के पीछे ही रहना होगा।