सुई तो लगी, पर सांसें अटकीं! बिल्ली के खरोंचने पर डेढ़ साल की मासूम को एंटी-रेबीज टीका, BMC अस्पताल पर सवाल

Mumbai BMC Hospitals: मुंबई के बीएमसी अस्पतालों में एंटी-रेबीज टीके के बाद स्पष्ट प्रोटोकॉल न होने से मरीज परेशान हैं। जोगेश्वरी और एम. डब्ल्यू. देसाई अस्पताल की घटनाओं ने व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
Questions raised about anti-rabies treatment and referral system in Mumbai BMC hospitals
प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स- सोशल मीडिया
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Mumbai BMC Anti Rabies Treatment: खेलते-खेलते डेढ़ साल की मासूम बच्ची को बिल्ली ने हल्का सा खरोंच दिया। परिजनों ने घबराकर उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां एंटी-रेबीज वैक्सीन की पहली खुराक दी गई। हालांकि, इसके बाद आगे के इलाज और जरूरी खुराक को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने से परिजनों की चिंता बढ़ गई है। मामला जोगेश्वरी ट्रॉमा अस्पताल का है।

पहली डोज के बाद आगे के इलाज को लेकर असमंजस

बच्ची की मां उमेहानी खान के मुताबिक, प्राथमिक क्लीनिक से बच्ची को जोगेश्वरी ट्रॉमा अस्पताल लाया गया था। यहां डॉक्टरों ने एंटी-रेबीज वैक्सीन की पहली खुराक दे दी, लेकिन इसके बाद परिजनों को आगे की प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट निर्देश नहीं मिले।

बच्ची की उम्र महज डेढ़ साल होने के कारण परिजन पहले से ही चिंतित थे। उनकी मुख्य चिंता यह है कि आगे कितनी खुराक की जरूरत होगी, निर्धारित समय पर वैक्सीन सरकारी अस्पताल में उपलब्ध होगी या नहीं और इलाज से बच्ची पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा।

प्रोटोकॉल को लेकर पहले भी उठे सवाल

मुंबई बीएमसी के अस्पतालों में एंटी-रेबीज उपचार के प्रोटोकॉल को लेकर असमंजस का यह पहला मामला नहीं है। हाल ही में एम. डब्ल्यू. देसाई अस्पताल में चूहे के काटने के बाद 10 वर्षीय बच्चे को श्रेणी-तीन के तहत दर्ज कर एंटी-रेबीज वैक्सीन दी गई थी। सीरम के लिए बच्चे को दूसरे अस्पताल भेजा गया था। उस समय सर्जन की अनुपलब्धता का हवाला देते हुए मरीज को जोगेश्वरी ट्रॉमा अस्पताल रेफर किया गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, चूहे के काटने के मामलों में इस तरह के उपचार प्रोटोकॉल को लेकर अभी भी स्पष्टता की जरूरत है।

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दवाओं के स्टॉक और रेफरल व्यवस्था पर सवाल

बिल्ली के खरोंच और चूहे के काटने से जुड़े इन मामलों ने BMC अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन के स्टॉक, उपचार प्रोटोकॉल और रेफरल व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। परिजनों का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल वैक्सीन की पहली खुराक देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि मरीज और परिवार को आगे के पूरे उपचार की स्पष्ट जानकारी भी दी जानी चाहिए।

ऐसे मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उपचार की प्रक्रिया, जरूरी दवाओं की उपलब्धता और रेफरल व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट करे, ताकि छोटे बच्चों के परिजनों को इलाज के दौरान अनिश्चितता और परेशानी का सामना न करना पड़े।

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