OBC आरक्षण पर बड़ी अपडेट: देवेंद्र फडणवीस सुलझाएंगे ओबीसी आरक्षण की तकनीकी गुत्थी

Maharashtra 27 OBC Castes Grammar Error Reservation: व्याकरण की गलतियों के कारण 27 ओबीसी जातियां 15 साल से आरक्षण से वंचित। फडणवीस ने दिया समाधान का भरोसा।
OBC Reservation Maharashtra 27 Castes
देवेंद्र फडणवीस सुलझाएंगे ओबीसी आरक्षण की तकनीकी गुत्थी (डिजाइन फोटो)
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OBC Reservation Maharashtra 27 Castes: महाराष्ट्र में जहाँ मराठा और धनगर आरक्षण को लेकर सड़कों पर बड़े आंदोलन हो रहे हैं, वहीं 27 ओबीसी जातियों का एक मूक संघर्ष पिछले डेढ़ दशक से जारी है। यह संघर्ष किसी नए कानून के लिए नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नामों को व्याकरण की दृष्टि से सही कराने के लिए है। 'महाराष्ट्र राज्य कार्यसमिति' के अनुसार, जातियों के नामों में मामूली भाषाई अंतर, जैसे किसी शब्द में 'उकार' या 'वेलेंटी' की गलती के कारण केंद्रीय सामाजिक न्याय विभाग इन समुदायों को सर्टिफिकेट जारी करने में अड़ंगा लगा रहा है।

भाजपा के ओबीसी नेता और विधायक परिणय फुके ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। पिछले छह महीनों से इस पर तेजी से काम चल रहा है। राज्य सरकार ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर केंद्रीय ओबीसी मंत्रालय और संबंधित बोर्ड को भेज दी है। अब प्रयास यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर इस "स्पेलिंग मिस्टेक" वाली समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जाए।

शिक्षा और नौकरियों में भारी नुकसान

समिति के अध्यक्ष श्रवण फरकाडे और जितेंद्र फरकाडे का कहना है कि इन तकनीकी त्रुटियों का परिणाम बहुत भयावह है। राज्य में तो इन जातियों को लाभ मिल जाता है, लेकिन जैसे ही बात केंद्रीय संस्थानों, यूपीएससी, एसएससी या पदोन्नति की आती है, केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार वर्तनी मेल न खाने पर उन्हें 'जनरल' श्रेणी में डाल दिया जाता है। पिछले 15 वर्षों में हजारों मेधावी छात्र केवल एक 'मात्रा' की गलती के कारण डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनने से चूक गए।

कागजी कार्रवाई में फंसा भविष्य

हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार और केंद्रीय ओबीसी आयोग ने सुधार की सिफारिशें पहले ही दे दी हैं, लेकिन केंद्रीय सामाजिक न्याय विभाग के स्तर पर इस सुधार की प्रक्रिया अत्यंत धीमी है। कृति समिति का आरोप है कि प्रशासन की इस सुस्ती ने समुदायों के भीतर भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। यह केवल एक भाषाई सुधार नहीं है, बल्कि 2 करोड़ लोगों के संवैधानिक अधिकारों की बहाली का मामला है।

दो पीढ़ियों का बलिदान

श्रवण फरकाडे ने कड़े शब्दों में कहा कि तकनीकी त्रुटियों के नाम पर दो पीढ़ियों को उनके हक से वंचित रखा गया है। जहाँ अन्य समुदाय आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वहीं ये 27 जातियां अपनी पहचान को सही साबित करने के लिए फाइलों के चक्कर काट रही हैं। अब जबकि मुख्यमंत्री और केंद्रीय स्तर पर हलचल शुरू हुई है, इन समुदायों को उम्मीद है कि 15 साल का यह 'वनवास' जल्द समाप्त होगा।

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