क्या नारियल से खोजा जा सकता है जमीन के नीचे का पानी, जानिए अंधविश्वास और विज्ञान का पूरा सच

Water Dowsing Science: महाराष्ट्र के कई इलाकों में नारियल और तांबे की छड़ से जमीन के नीचे पानी खोजने वाले 'पाणाडी' की परंपरा आज भी जारी है। जानिए इसके पीछे का असली विज्ञान।
Water Dowsing Science Vs Superstition
जमीन के नीचे पानी खोजने के तरीके (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Water Dowsing Science Vs Superstition: हाथ में सूखा नारियल, तांबे की 'L' आकार की छड़ें या नींबू की टहनी लेकर जमीन के नीचे पानी खोज निकालने का दावा... यह नजारा सिर्फ महाराष्ट्र के गांवों का नहीं, बल्कि भारत के कोने-कोने की एक आम तस्वीर है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी खोजने वाले इन पारंपरिक जानकारों को कहीं 'पाणाडी', कहीं 'सूंघने वाले' तो कहीं 'वॉटर डाउजर' कहा जाता है।

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में खासकर सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में जब कोई किसान कुआं या बोरवेल खोदने के बारे में सोचता है, तो वह अक्सर भूजल भूविज्ञानी के बजाय पाणाडी को बुलाता है। पानी का पता लगाने वाले पारंपरिक जानकार को पाणाडी कहते हैं। पाणाडी नारियल, तांबे की छड़ या नींबू की टहनी लेकर खेत में घूमता है और पानी का स्रोत खोजने का दावा करता है। दुनिया भर में इस प्रक्रिया को डाउजिंग या वॉटर विचिंग के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं, देश भर में फैली इस रहस्यमयी प्रथा के पीछे का असली सच क्या है।

क्या है महाराष्ट्र की पाणाडी प्रथा?

महाराष्ट्र के ग्रामीण समाज में पाणाडी को बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां पानी खोजने की प्रक्रिया केवल एक तकनीकी खोज नहीं है। इसमें किसी अनुष्ठान जैसा भाव भी शामिल होता है। खेत में आने से पहले पाणाडी शुद्धता से जुड़े अनुष्ठान करता है। जिस जगह पर खोज होनी है, वहां भेंट के तौर पर नारियल फोड़ा जाता है। अक्सर इसके साथ कुलदेवता का आह्वान या भूमि पूजन भी किया जाता है।

पाणाडी कैसे खोजते हैं पानी?

सबसे लोकप्रिय तरीका यह है कि छिलका उतरे हुए नारियल को हथेली पर सीधा संतुलित किया जाए। दावा किया जाता है कि जैसे-जैसे पाणाडी खेत में चलता है, हथेली पर रखा नारियल एक खास जगह पर पहुंचते ही अपने आप सीधा खड़ा हो जाता है। कुछ पाणाडी अंग्रेजी अक्षर 'L' के आकार की धातु की दो छड़ें पकड़ते हैं। पानी का स्रोत मिलने पर ये छड़ें एक-दूसरे को क्रॉस करती हैं।

इसके अलावा, नींबू या बबूल की टहनी का सिरा जमीन की ओर झुक सकता है। समाज में यह मान्यता भी प्रचलित है कि जो लोग जन्म के समय पहले पैरों के बल बाहर आए थे, उनमें जमीन के नीचे पानी खोजने की जन्मजात क्षमता होती है।

Water Dowsing Science Vs Superstition
जमीन के नीचे पानी खोजने के तरीके (सोर्स: सोशल मीडिया)

पाणाडी के दावों का क्या है सच?

विज्ञान और भू-विज्ञान पानी खोजने वाले पाणाडी के इन दावों को पूरी तरह से गलत बताते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से यह तरीका सिर्फ एक भ्रम है। पानी की वजह से नारियल का सीधा खड़ा होना या छड़ों का हिलना, किसी रहस्यमयी ताकत या चुंबकीय खिंचाव का नतीजा नहीं है। यह इंसानी शरीर के दिमाग और मांसपेशियों से जुड़ी एक घटना है, जिसे विज्ञान में आइडियोमोटर इफेक्ट कहा जाता है।

जब कोई पानी खोजने वाला किसी खेत में चलता है, तो उसके दिमाग में पानी मिलने की अवचेतन संभावना होती है। नतीजतन, उसके हाथों की मांसपेशियां बहुत छोटी-छोटी, अनैच्छिक हरकतें करती हैं। इन छोटी-छोटी हरकतों से सामने पकड़े हुए नारियल या छड़ में गति आती है, जिससे ऐसा लगता है कि वे काफी हिल रहे हैं।

पानी खोजने वाले पाणाडी को ऐसा लग सकता है कि कोई बाहरी ताकत यह हरकत करवा रही है, लेकिन असल में यह उसके अपने हाथों की मांसपेशियों की वजह से होता है। इसके अलावा, भू-विज्ञान के अनुसार, भूजल बड़े पैमाने पर फैला होता है यह चट्टानों की दरारों, मुरम या रेत के कणों के बीच मौजूद होता है। अगर ऐसे इलाके में खुदाई की जाए जहां पानी भरपूर मात्रा में है, तो पानी मिलने की संभावना ज्यादा होती है।

पाणाडी की भविष्यवाणियां क्यों सफल होती हैं?

अब सवाल उठता है कि अगर विज्ञान पाणाडी के दावों को नकारती है तो फिर उनकी भविष्यवाणियों सफल कैसे होती है? वैज्ञानिकों के अनुसार इस सफलता का मुख्य कारण स्थानीय इलाके के बारे में उनकी पारंपरिक जानकारी है। चूंकि कई पाणाडी सालों से एक ही इलाके में रह रहे हैं, इसलिए उन्हें वहां की मिट्टी, पेड़-पौधों और भौगोलिक बनावट के बारे में बहुत अनुभव होता है।

Water Dowsing Science Vs Superstition
नारियल से जमीन के नीचे पानी खोजने के पारंपरिक तरीके बनाम विज्ञान (सोर्स: AI)

उदाहरण के लिए, वे जानते हैं कि निचले इलाकों में या जहां गूलर, कचनार और बबूल जैसे पेड़ ज्यादा होते हैं, वहां भूजल का स्तर ऊंचा होता है। पानी की तलाश करते समय वे अनजाने में ही इस अनुभव का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, संभावना के नियमों के आधार पर उनकी भविष्यवाणियों के सही होने की संभावना उन इलाकों में ज्यादा होती है, जहां पानी मिलने की संभावना पहले से ही अधिक होती है। हालांकि, ऊबड़-खाबड़ और पथरीले इलाकों में ये तरीके अक्सर फेल हो जाते हैं।

पाणाडी से क्यों लगाते है पानी का पता

अंधविश्वास-विरोधी समिति ने कई बार उन्हें सीलबंद पाइपों में पानी का पता लगाने की चुनौती दी है, लेकिन कोई भी ऐसे वैज्ञानिक टेस्ट में सफल नहीं हो पाया है। फिर भी, महाराष्ट्र की ग्रामीण संस्कृति में पाणाडी सामूहिक उम्मीद का केंद्र बना हुआ है। जब किसान कुएं के लिए अपनी जीवन भर की कमाई दांव पर लगाते हैं, तो उन्हें मानसिक तसल्ली की जरूरत होती है।

गरीब किसानों को अक्सर आधुनिक मशीनरी का इस्तेमाल बहुत महंगा या अपरिचित लगता है। इसके बजाय वे अपने ही गांव के पाणाडी पर ज्यादा भरोसा करते हैं। भले ही इस तरीके का कोई वैज्ञानिक आधार न हो, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इस परंपरा का बहुत भावनात्मक महत्व है।

संक्षेप में कहे तो पाणाडी पद्धति कोई झाड़-फूंक या अंधविश्वास नहीं है, बल्कि यह मानसिक क्षमताओं में विश्वास और पीढ़ियों से चले आ रहे भौगोलिक अनुभव का मिश्रण है। हालांकि, अगर किसी को कुआं या बाेरवेल के ऐसे कामों को लिए कोई बड़ा निवेश करना है तो सिर्फ परंपरा पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल करना ही सबसे सुरक्षित तरीका है।

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