Gondia Burad Workers News: गोंदिया के बुरड कामगार पिछले 41 वर्षों से अपने हक और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वन कानूनों की मार से बुरड़ व्यवसाय बदहाल हो गया है। आज के बदलते युग में बांबू कला को बढ़ावा नहीं दिए जाने के कारण यह कला अब नष्ट होने की कगार पर है।
बांबू के माध्यम से विभिन्न जीवनावश्यक और आकर्षक सामग्री बनाकर अपनी आजीविका चलाने वाले जिले के हजारों बुरड कामगार आज आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। वन कानून और अन्य समस्याओं के चलते उन्हें बांबू उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिससे उनकी स्थिति और भी खराब हो गई है।
गोंदिया जिले को प्रकृति ने बड़े पैमाने पर वन संपदा दी है, जिसमें बांबू भी शामिल है। पहले, बांबू आसानी से उपलब्ध था, जिससे हजारों परिवार बुरड़ व्यवसाय से जीवनयापन करते थे। लेकिन अब यह व्यवसाय खत्म होने की कगार पर है।
अंग्रेजों के शासन के पहले से यह व्यवसाय चलता आ रहा है, और अंग्रेजों ने भी इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया था। लेकिन अब शासन द्वारा अनेक नियमों को लागू किया जा रहा है, जिससे बुरड़ व्यवसायियों को खत्म किया जा रहा है।
1982 में बुरड़ कामगार नेता लक्ष्मण चंद्रीकापुरे द्वारा मुंबई हावड़ा राष्ट्रीय महामार्ग रोककर बड़ा आंदोलन किया गया था। इस आंदोलन में हजारों बुरड़ कामगार शामिल हुए थे।
महामंडल की स्थापना की आवश्यकता इस आंदोलन के बाद महसूस की गई, ताकि बुरड़ व्यवसाय को जीवित रखा जा सके। एससी, एसटी प्रवर्ग के हजारों परिवार इस व्यवसाय पर निर्भर हैं।
वनविभाग और समाज कल्याण द्वारा बांबू उपलब्ध कराकर इस व्यवसाय को बढ़ावा देने की जरूरत है। 14 अप्रैल 1983 को राष्ट्रीय महामार्ग को रोककर एक बड़ा आंदोलन किया गया था, जो बुरड कामगारों की समस्याओं को उजागर करता है।